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Monday, 6 April 2020

भारत को आत्मनिर्भर बनना होगा

डॉ अशोक कुमार गदिया
चेयरमैन, मेवाड़ यूनिवर्सिटी
आज तालाबंदी के 12 दिन पूरे हो गये हैं। मुझे घर में बंद हुए 16 दिन हो चुके हैं। सपरिवार घर में बंद हूँ। मैं क्या बंद हूँ पूरा भारत बंद है। भारत ही क्या लगभग सारा विश्व बंद है। ऐसा लगता है कि पूरा विश्व रुक-सा गया है। जो शहर 24 घंटों काम करते थे। कभी बंद नहीं होते थे, वे पूर्णतया बंद हैं। सिर्फ आवश्यक सेवाएँ खुली हुई हैं। प्रिंट मीडिया, सोशल मीडिया और टीवी चैनल खुले हुए हैं।
पूरा विश्व भय एवं आशंकाओं से भरा हुआ है। घर बैठे हर वर्ग के लोग दुखी एवं चिन्तित हैं। उनकी मुख्य चिन्ताएँ हैं-
1- यह कोविड-19 कब काबू में आएगा? कब इसकी माकूल दवा बनेगी और लोगों में निश्चिन्तता आएगी?
2- कोरोना वायरस की उपज प्राकृतिक है या मानवकृत? यदि यह मानवकृत है तो यह वायरस किसने तैयार किया?
3- कुछ लोग कहते हैं कि इसे चीन ने अपनी प्रयोगशालाओं में तैयार किया। कुछ लोग कहते हैं कि इसे अमेरिका ने बनाया और चीन में छोड़ दिया। जबकि चीन ने इसे छिपाया है। उसने विश्व स्वास्थ्य संगठन से सांठगांठ कर पूरे विश्व में फैलने दिया। लोग जानना चाहते हैं कि असली कारण क्या हैं? असल कारणों का जानना अति आवश्यक है। क्योंकि इससे अमेरिका एवं चीन को छोड़कर सम्पूर्ण विश्व अपनी अगली रणनीति बनायेगा। द्वितीय विश्व युद्ध से अबतक के घटनाक्रमों पर नज़र डालें तो पता चलता है कि अमेरिका एवं चीन दोनों ऐसे राष्ट्र हैं जिनमें मानवता नाम की भावना अंशमात्र भी नहीं है। इन्हें अपने देश और अपनी दादागिरी से मतलब है। ये दोनों राष्ट्र विश्व के सारे संसाधनों का पूरी तरह से उपभोग करना चाहते हैं। सारे विश्व को आर्थिक, सामाजिक एवं वैचारिक रूप से गुलाम बनाकर रखना चाहते हैं। ये दोनों भी अपनी सर्वश्रेष्ठता तय करने के लिए अप्रत्यक्ष रूप से आपस में लड़ते रहते हैं। दूसरे छोटे एवं गरीब मुल्कों को बर्बाद करते रहते हैं। यह तो सर्वविदित है कि मुस्लिम आतंकवाद की जड़ सऊदी अरब है और अमेरिका इसको संरक्षण देता है। सभी मुस्लिम देशों में ज़बरदस्त झगड़े एवं फसाद करवाता है। अमेरिका ही धीर-धीरे उनको बर्बाद कर रहा है। यह भी सर्वविदित है कि अमेरिका एवं यूरोप ऐसी दवाइयाँ बना रहा है कि जो आम आदमी में एक रोग का इलाज कर उसमें दूसरा रोग पैदा कर देती हंै, जिससे उनका गोरखधंधा दिन दोगुना रात चैगुना चलता रहे। यह भी सर्वविदित है कि अमेरिका एवं चीन एक से बढ़कर एक विध्वंसक हथियार बना रहे हैं और दूसरे देशों को बेरोक-टोक बेच रहे हैं। यह भी सर्वविदित है कि अमेरिका एवं चीन विश्व के सभी बुद्धिमान लोगों को अपने पास बुलाकर उनकी मेधा का उपयोग अपनी सम्पत्ति बढ़ाने एवं बाकी सभी देशों के शोषण करने में लगा हुआ है।
यह भी सर्वविदित है कि दुनिया की अधिकांश भौतिक एवं बौद्धिक सम्पदा एवं क्षमता चीन एवं अमेरिका या उनके पिट्ठू देशों में केन्द्रित है। यह भी सर्वविदित है कि अमेरिका एवं चीन दोनों को भारत एवं भारत की भौतिक, बौद्धिक एवं युवा जनशक्ति फूटी आँख नहीं सुहाती है। यह भी सर्वविदित है कि अमेरिका एवं चीन भारत की अखंडता, अनेकता में एकता, प्रजातंत्र, सर्वधर्म सम्भाव, ईश्वरीय विश्वास एवं हर मुसीबत के समय 130 करोड़ लोगों को सारे मतभेद भुलाकर एक हो जाना बिल्कुल भी रास नहीं आता। यह भी सर्वविदित है कि अमेरिका एवं चीन भारत में हर तरह के षड्यंत्र रचकर इसे विघटित कर इस विशाल एवं महान देश के टुकड़े-टुकड़े करना चाहता है। इसके लिए दोनों देश पाकिस्तान का भरपूर इस्तेमाल करते हैं। तो इसमें क्या शंका है यदि कोरोना अप्राकृतिक है तो, या तो इन दोनों देशों की या इनमें किसी एक की यह कारस्तानी ज़रूर है। ये लोग अपने देश को छोड़कर पूर्णरूप से अमानवीय हैं। अतः ऐसी स्थिति बनाकर सारे विश्व में अफरा-तफरी फैलाकर ये अपना उल्लू सीधा करने की कोशिशों में लगे हुए हैं। सारे विश्व की अर्थव्यवस्था बर्बाद कर सारी सम्पत्ति हथिया लेने की फिराक में हैं। इसलिये यह बड़ी चिन्ता का विषय है।
4- लोगों की यह भी चिन्ता है कि लाॅकडाउन खुुलने पर देश में रोज़गार, व्यापार, अर्थव्यवस्था, शिक्षा, कृषि आदि का क्या होगा?
5- लोगों की यह भी चिन्ता है कि यह कोरोना फिर अक्टूबर-नवम्बर के महीने में वापस तो नहीं आ जाएगा?
इन सब चिन्ताओं के मध्य यह समझ आता है कि भारत के पुनर्निर्माण का समय आ गया है। हमारे नेताओं, नीति निर्धारकों, बुद्धिजीवियों, समाजसेवकों, लेखकों, साहित्यकारों, कवियों एवं पक्षकारों को मिल-बैठकर हमारे व्यापारियों और उद्योगपतियों को विश्वास में लेकर निम्नलिखित फैसले लेने पड़ेंगे-
1- भारत अपनी ज़रूरत की हर वस्तु अपने यहाँ बनायेगा। चाहे इसकी कितनी भी क़ीमत जनता को क्यों न देनी पड़े।
2- भारत सिर्फ निर्यात करेगा। तकनीक को छोड़कर बाकी का आयात योजनबद्ध तरीके से अगले 5 वर्ष में बिल्कुल ख़त्म कर देगा।
3- भारत सिर्फ तकनीक का आयात करेगा। किसी विषयवस्तु का नहीं।
4- भारत अपनी कृषि का उत्कृष्ट विकास करेगा और इसे उद्योग का दर्जा देगा। हर क़ीमत पर इसे लाभकारी क्षेत्र बनाएगा।
5- भारत श्रम का शोषण हर क़ीमत पर ख़त्म करेगा।
6- भारत अपनी आंतरिक एवं बाहरी सुरक्षा मजबूत करेगा।
7- भारत का हर नौजवान 18 वर्ष की उम्र के बाद 2 वर्ष के लिए फौज में काम करेगा।
8- भारत अपनी हर क़ीमत पर न्याय व्यवस्था पारदर्शी एवं मजबूत करेगा। 
9- भारत में दसवीं कक्षा तक की शिक्षा अनिवार्य हो, निःशुल्क हो, सबके लिए समान पाठ्यक्रम हो और सबके लिए एक तरह की सुविधाएँ हों, जिसमें भारत का गौरवशाली इतिहास, संस्कृति, सभ्यता, साम्प्रदायिक सद्भाव, सामाजिक संवेदनशीलता, महापुरुषों की जीवनियाँ अनिवार्य रूप से पढ़ाई जाएँ। देशभक्ति एवं समाजसेवा का भाव हर नौजवान में स्वाभाविक रूप से विकसित हो सके, इसकी समुचित व्यवस्था हो। बच्चे का दसवीं कक्षा पास करने का पैमाना भी यही हो। तभी भारत बच पाएगा।

Sunday, 29 March 2020

कभी सोचा न था कि..

दुनियाँ भर में फैले कोरोना संकट पर मेवाड़ विश्वविद्यालय के कुलाधिपति डॉ अशोक कुमार गदिया की एक महत्वपूर्ण कविता


कभी सोचा न था कि
इस तरह घरों में क़ैद होकर रहना पड़ेगा।
कभी सोचा न था कि
विकास की अंधी दौड़ में
मानव प्रजाति
अपने ही विनाश का सामान
खुद ही बनाने लगेगी।
कभी सोचा न था कि
विश्व का विज्ञान, तकनीक, प्रौद्योगिकी,
प्रकृति की छोटी-सी मार के सामने घुटने टेक देगी।
कभी सोचा न था कि
विश्व के सभी बाज़ार, यातायात के साधन, देवालय
सभी एक साथ बंद हो जाएंगे।
कभी सोचा न था कि
चीन, अमेरिका, यूरोप के सभी देश मिलकर
कुछ कर नहीं पाएंगे।
उनके शीर्ष नेता बेबस, लाचार एवं मजबूर दिखाई देंगे।
कभी सोचा न था कि
प्रकृति, मानव की विकृति को
इतनी बड़ी सज़ा देगी कि
मानव प्रजाति का अस्तित्व ही ख़तरे में पड़ जाएगा।
कभी सोचा न था कि
आदमी को आदमी से दूर कर दिया जाएगा।
कभी सोचा न था कि
इंसान को इंसान से दूर रखने में ही
जीवन की कल्पना होगी।
कभी सोचा न था कि
मानवकृत विकास, वैभव, संसाधन, धन-दौलत
सभी बेमाने हो जाएंगे।
ज़िन्दगी बचाने के लाले पड़ जाएंगे।
कभी सोचा न था कि
जान है तो जहान हैकी कहावत
अपने जीते जी चरितार्थ होगी और
सारा विश्व इस बात को
गला फाड़-फाड़कर कहेगा।
कभी सोचा न था कि
विश्व के सभी लोगों को भारतीय दर्शन,
भारतीय शिष्टाचार एवं
भारतीय खान-पान अपनाना पड़ेगा और
इसी में सर्वकल्याण है, यह कहना पड़ेगा।
कभी सोचा न था कि
अहिंसा परमो धर्म, त्याग-तपस्या एवं
एकांतवास जीवन का फलसफा होगा।
अब सोचता हूँ कि
ईश्वर प्रकृति अपनी कृपा करे,
मानव की ग़लतियों को माफ करे।
इस जाति को बचाये एवं
हम सबको दहशत से उबारे।
हमें अपने घरों में इस अनचाही क़ैद से मुक्त करे।
लेखक
डॉ. अशोक कुमार गदिया
चेयरमैन, मेवाड़ ग्रुप ऑफ इंस्टीट्यूशंस
चेयरमैन, विश्वविद्यालय

प्रकृति का दोहन नहीं संरक्षण करें


डॉ. अशोक कुमार गदिया
चेयरमैन, मेवाड़ ग्रुप ऑफ इंस्टीट्यूशंस

चेयरमैन, विश्वविद्यालय
 आज पूरा देश वैश्विक महामारी से जूझ रहा है। पूरा विश्व आशंकित है कि क्या मानव प्रजाति बचेगी या नहीं? मनुष्य प्रजाति पर इतना बड़ा प्राकृतिक संकट पिछले सौ वर्षों में कभी नहीं आया। विश्व की सारी महाशक्तियाँ बेबस, लाचार एवं असहाय महसूस कर रही हैं। विज्ञान एवं वैज्ञानिक हतप्रभ हैं। वे बहुत प्रयास करके भी इस वायरस की काट नहीं ढूंढ पा रहे हैं। शासन-प्रशासन जी-तोड़ कोशिश कर रहा है। संक्रमण को रोकने पर धीरे-धीरे अपना नियंत्रण खो रहा है। आम लोग दहशत में हैं। हर तरफ अँधेरा, अविश्वास, निराशा एवं हताशा का माहौल बढ़ता जा रहा है। लगभग पूरा विश्व तालों में बंद है। चारों तरफ संत्रास है, बेचैनी है, महामारी तक पहुंचने का भय है, आतंक है, बदहवासी है। सभी तरह के विकास, विज्ञान, प्रौद्योगिकी, होशियारी, दादागिरी, अस्त्र-शस्त्र, धार्मिक उन्माद एवं अंधविश्वास, टोना-टोटका, ज्योतिषीय कर्मकांड, झाड़-फूंक, मंदिर-मस्जिद, गिरजाघरों एवं गुरुद्वारों में बैठे मठाधीश अपनी जान बचाने में लगे हुए हैं। सभी देवालय वीरान हो गये हैं। सबकी हेकड़ी निकल गई है। मौत मुंहबाये सामने खड़ी दिख रही है। कभी सोचा है ऐसा क्यों हो रहा है? यह प्रकृति के साथ हुई छेड़छाड़, दुव्र्यवहार, दुराचार एवं बलात्कार की छोटी-सी चीत्कार है। अगर मानव प्रजाति नहीं सुधरी तो और बहुत कुछ होगा। ऐसी विनाश लीला होगी कि मानव प्रजाति का नामलेवा नहीं बचेगा। कहाँ गये तुम्हारे ज्ञान, विज्ञान, तकनीक, सूचना- प्रौद्योगिकी, आयुर्विज्ञान, शोध एवं तमाम तामझाम, तुम तो भगवान यानी प्रकृति को एक दोहन एवं इस्तेमालशुदा चीज़ मान बैठे। तुमने तो भोग का दर्शन दिया और कहा कि आदमी के आराम एवं विलासिता के लिये हम प्रकृति का आखिरी हद तक इस्तेमाल करेंगे। हम हवा गंदी करेंगे। हम पानी गंदा करेंगे। हम जंगल नहीं रहने देंगे। हम सारे जीव-जन्तु, पशु-पक्षी सबको खा जाएंगे। हम अंतरिक्ष को अपना घर बना देंगें। उसके गर्भ का सारा पानी बाहर निकालकर पाखाने में बहाकर गंदा कर नदियों में डाल देंगे। और इन्हें गंदा-बदबूदार नाला बना देंगे। हम नहाएंगे नहीं हफ्तों तक। हम कपड़े नहीं धोएंगे सालों तक। हम अपने बेडरूम में पाखाना बनाएंगे। औरत और आदमी खड़े-खड़े मूत्र विसर्जन करेंगे। शौच कर धोएंगे नहीं सिर्फ काग़ज़ से साफ करेंगे। और अपना घर सड़ाएंगे। हम सब बेमेल चीज़ें खाएंगे। ऐसा होगा तो होना ही है। हम रातभर काम करेंगे। दिनभर सोएंगे। हम शुद्धता एवं पवित्रता का बिल्कुल ध्यान नहीं रखेंगे। हम अपनी संस्कृति, सभ्यता एवं अपनी सदाशयता की प्रवृत्ति भूल गये। हम हमेशा प्रकृति के पूजक रहे हैं। लेकिन अब प्रकृति के भक्षक हो गये हैं। हमें सिखाया गया था कि प्रकृति का सदुपयोग उतना ही किया जाना चाहिए जितना जीने के लिए आवश्यक हो। परन्तु यह क्या हो गया? हम विश्व की भोग की संस्कृति में डूब गये। हमें फिर अपने स्वर्णिम अतीत को जीवित करना होगा। त्याग, तपस्या, समर्पण एवं सबका संरक्षण सीखना होगा। जड़-चेतन, नभ, जल एवं थल सबके दोहन की मनोवृत्ति छोड़नी होगी। इनसे यदि कुछ लेना हो तो याचक के रूप में ज़्यादा देकर कम लेने का भाव जगाना होगा। सबमें जीव, जड़, चेतन के दर्शन करना होगा। तभी होगा सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामया। सर्वे भद्राणी पश्यन्तु मा कश्चित् दुःखभाग् भवेत।। अहिंसा परमो धर्मःकी संस्कृति लाकर जियो और जीने दो के सिद्धांत पर चलना होगा। तब बच पायेगी मानव प्रजाति, वरना इसका विनाश तय है। कोरोना का हमला, यह तो मात्र संकेत है। असली विनाश लीला तो अभी बाकी है। अतः भारतवर्ष के लोगों से करबद्ध प्रार्थना है कि वह अपने मूल संस्कार, संस्कृति एवं कर्तव्यों को पहचानें एवं उनपर चलना प्रारम्भ करें। जाति-पांति, भेदभाव, ऊंच-नीच, अमीर-ग़रीब, स्त्री-पुरुष, शोषक एवं शोषित, मजदूर, किसान के भेदभाव को मिटाकर एकसाथ मिलकर सह-अस्तित्व के भाव को जगाते हुए रहना सीखें। जिसके मूल तत्व हैं-जियो और जीने दो। जिसकी आत्मा हो-सहकार एवं सहयोग। जिसके कर्म हों-हर हाथ को काम। हर व्यक्ति को अपनी मेहनत, लगन एवं प्रतिभा के आधार पर आगे बढ़ने के समान अवसर। सबको अपने परिश्रम का उचित मेहनताना मिले। सब खुश रहें। आबाद रहें। मिल-जुलकर विकास करें।

Friday, 7 September 2018

स्वाधीनता दिवस पर चेयरमैन सर का विशेष संबोधन


स्वाधीनता दिवस पर मेवाड़ विश्वविद्यालय के चेयरमैन डॉ अशोक कुमार गदिया का प्रेरणादायक संबोधन  
आज हम भारत देश पर निगाह डाले तो पायेंगे कि यह एक विशाल देश है। जहाँ 130 करोड़ लोग रहते हैं। इन 130 करोड़ लोगों में 65-70 करोड़ लोग युवा है और यह विश्व की सबसे अधिक युवा आबादी का देश है। इस मायने में हमारा देश एक युवा देश है। हालांकि हमारी संस्कृति, सभ्यता एवं अस्तित्व शायद विश्व में सबसे पुराना है।
एक युवा देश होने के नाते हमारे देश में कुछ स्वभाविक लक्षण होने चाहिए, जैसे कि अत्यधिक शक्ति, जोश , स्फूर्ति एवं हर समय कुछ नया एवं विशिष्ठ करने का ज़ज्बा, नयी उमंगे, खेल-कूद, साहसिक काम, अध्ययन एवं अनुसंधान, व्यापार, व्यवसाय, रोजगार, कला-संस्कृति, देश -भक्ति, समाज सेवा, नई तकनीक, फैशन साज-सज्जा आदि में अव्वल हो। क्योंकि जहाँ युवा पीढ़ी होगी वहाँ ये कार्य स्वभाविक रूप से नित नूतन तरीकों से एक से बढ़कर एक होंगे, होने भी चाहिए। जब वास्तविकता पर दृष्टिपात करेंगे तो पायेंगे कि हमारे यहाँ इन सब चीजों में जिस अनुपात में प्रगति होनी चाहिए उतनी नहीं हुई है। इन सब कामों में विश्व स्तर की पूर्ण निपुणता, गुणवत्ता एवं संख्या दोनों में बहुत कम है और हमारी युवा जनसंख्या के अनुपात में तो ये नगण्य है।
इस पिछड़ेपन का मूल कारण क्या है? बहुत सोचने पर जो मुझे समझ आता है, वह यह कि हमारे नौजवानों को घर से लेकर विद्यालय, महाविद्यालय एवं विश्वविद्यालय तक न तो उचित शिक्षा मिली न उचित प्रशिक्षण मिला और न उचित सलाह एवं प्रोत्साहन मिला।
कहने का मतलब यह है कि युवाओं का स्वाभाविक विकास नहीं हुआ। उसका विकास व्याप्त रीति-रिवाज, परिस्थितियां, देखा-देखी, दुष्प्रचार, गलतफहमी, गलत सरकारी नीतियाँ, राजनैतिक दलों की साजिश , असामाजिक तत्वों के प्रलोभन से हुआ। उसका नतीजा है हर तरफ अफरा-तफरी, आतंक एवं हिंसा, असंतोष, भ्रष्टाचार, शोषण, जातिवाद, बेरोजगारी, सरकारी नौकरी का लालच एवं सरकार पर पूर्ण निर्भरता, काम चोरी, हरामखोरी, अनुशासनहीनता, चोरी, डकैती, लूट, झूठ, हेरा-फेरी, मिलावट एवं कम तौल, हत्या, बलात्कार, आत्महत्या, बेवजह तनाव, नशाखोरी, सामाजिक असमानता आदि से ग्रसित है हमारी युवा पीढ़ी, और यह मानसिकता दिन-प्रति-दिन बढ़ती जा रही है।
किसी भी राष्ट्र एवं समाज को यदि उन्नति के शिखर पर पहुँचना है, खुशहाल होना है तो उस देश  का युवा जब तक आत्मविश्वास  से भरपूर, आत्मनिर्भर, अपने अधिकारों एवं दायित्वों के प्रतिपूर्ण रूप से सजग, सामाजिक रूप से संवेदनशील राष्ट्रीय रूप से देशभक्त अपनी संस्कृति, सभ्यता एवं महापुरुषों का आदर करने वाला मानसिक एवं शारीरिक रूप से पूर्णतया विकसित एवं सुदृढ़ नहीं होगा, तब तक देश  उन्नति के शिखर पर नहीं पहुँच सकता। वहाँ का समाज प्रगतिशील  एवं सभ्य नहीं हो सकता। अतः इस कालखण्ड में सबसे महत्वपूर्ण राष्ट्रीय एवं सामाजिक कार्य यदि कोई है तो वह है युवा पीढ़ी के बीच काम करना, उनको अच्छे से पढ़ाना, लिखाना, प्रशिक्षण करवाना, सामाजिक एवं राष्ट्रीय विषयों की पूर्ण प्रमाणिक जानकारी देना और उनमें सामाजिक एवं राष्ट्रीय चेतना जागृत करना। उनको इस देश  की कला संस्कृति, संस्कार एवं महापुरुषों के साथ जोड़ना और उनके प्रति गौरव का भाव पैदा करना। उनमें हर परिस्थिति में देश  एवं समाज के हित में कुछ करते रहने का जज्बा पैदा करना। समाज के पिछड़े एवं दबे हुए उपेक्षित तबके के प्रति दया का भाव नहीं अपनेपन का भाव जगाना और लगातार उनके विकास के लिये कुछ करते रहने का भाव पैदा करना। नौजवानों की अच्छी नौकरी लगवाना, जो अच्छी नौकरी नहीं कर सकते उन्हें अच्छे उद्यमी बनने की ओर अग्रसित करना, हर नवयुवक को अपने व्यक्तित्व को निखारने का सुअवसर प्रदान करना और उसको एक जिम्मेदार नागरिक बनाना और अंततः उसको अपनी विद्या में एक कामयाब पेशेवर बनाकर सामाजिक जीवन में भेजना, यह है आज के समय का युग धर्म।
अब यह सवाल उठता है कि यह सब काम कहाँ होंगे, कब होंगे, और कौन करेगा और कैसे होंगे? इन सब प्रश्नों  के उत्तर देने से पहले मैं एक बात और स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि यह नौजवान तैयार करने की प्रक्रिया लगातार चलने वाली प्रक्रिया है यह कोई एक दिन का एक सप्ताह या एक माह के प्रशिक्षण शिविर से पूरी नहीं होने वाली है और इस काम को सरकार तो बिल्कुल भी नहीं कर सकती है। यह नौजवान तैयार करने का काम महाविद्यालय एवं विश्वविद्यालयों में दिन-प्रति-दिन होगा। इसको करेंगे रोज पढ़ाने वाले प्राध्यापक एवं प्रबन्धन के वरिष्ठ जन और यह होगा एक विशिष्ट शैक्षणिक पद्धति का गठन कर, उसको उपयोग में लाने से , वह विशिष्ट पद्धति है जिसमें अध्यापक का कार्य हो। अच्छे से अच्छा पढ़ना एवं पढ़ाना इनमें निम्नलिखित काम दिन-प्रति-दिन करने होंगे-
पढ़ना-पढ़ाना, एवं सिखाना यह ऐसी प्रक्रिया है जिसके अध्यापक को अपने विद्यार्थियों के साथ रोज करनी पड़ती है। इसके कई तरीके हैं जिसमें मुख्य रूप से सबसे पहले अध्यापक अपना विषय कक्षा में पढ़ाता है तथा 4-5 दिन लगातार पढ़ाकर अपना एक यूनिट पूरा करता है उसके बाद उसी यूनिट को पुनः पढ़ाने के लिये बच्चों से सहयोग लेता है। वह कुछ बच्चों से प्रजेन्टेश न करवाता है, कुछ बच्चों से एसाइमेन्ट लेता है, कुछ बच्चों से चार्ट बनवाता है, कुछ बच्चों से मॉडल बनवाता है और फिर यूनिट टेस्ट लेता है। इसके बाद जरूरत पड़ने पर उस यूनिट पर एक गेस्ट लेक्चर करवाता है। इस तरह से सभी यूनिटों को पढ़ाकर उस विषय की टीचिंग लर्निंग पूरी करवाता है। यह पढ़ने, पढ़ाने एवं सिखाने का सर्वोत्तम तरीका है। फिर दूसरा महत्वपूर्ण काम  है प्रैक्टिकल ट्रेनिंग, उसमें हर बच्चे को अपने कोर्स के दौरान भारत की सबसे अच्छी या विदेश  की सबसे अच्छी ट्रेनिंग इन्स्टीट्यूट में ट्रैनिंग करने के लिये भेजना और वहाँ पर बच्चों के मुख्य विषय से संबंधित कोई एक लेटेस्ट मॉडल करवाना और वहाँ से एक सर्टिफिकेट लेना रहता है। उसके बाद अन्तिम सेमेस्टर में किसी इन्डस्ट्री या प्रोफेशनल फर्म में इंटर्नशिप के लिये जाना होता है। इस तरह उसकी पढ़ाई पूरी करायी जाये। इस पूरे प्रोसेस में एक-एक बच्चे का ध्यान रखा जाए और हर बच्चा अपने आप में एक विषिष्ट प्रतिभा के रूप में विकसित कर सामाजिक जीवन में भेजा जाये।
अन्त में कई तरह की कम्पनियाँ बुलाकर उसकी मनमर्जी नौकरी दिलवाई जाये। यदि वह नौकरी में रुचि नहीं रखता तो उसे अपनी पारिवारिक परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए उसे किसी व्यापार, व्यवसाय या उद्योग में लगवाने का परामर्श  तथा यदि उसे किसी लोन की जरूरत है तो उसको लोन दिलवाने की व्यवस्था करना तथा बच्चे का पूरा रिकार्ड अपने पास रखना जो कि आपकी Achieves  में सुनिश्चित हो जिससे कि हमारा उससे जीवन-भर का सम्बन्ध स्थापित हो जाये।
दूसरा विद्यार्थियों के लिये एक मित्र, मार्गदर्शक  एवं गुरु का काम करना और यह दोनों काम अध्यापक की सेवा कार्य का अनिवार्य हिस्सा हो कि उसे इस काम को करना ही करना है।
“A teacher has to be mentor or counselor, counseling must be integral part of his duly as teacher”
इसके साथ-साथ ही शैक्षणिक दिनचर्या ऐसी होनी चाहिए कि पढ़ने पढ़ाने एवं काउंसिलिंग के अतिरिक्त ऐसी गतिविधियां एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम लगातार करते जाना जिससे विद्यार्थी एवं अध्यापकों का सर्वांगीण विकास हो जिससे उनमें राष्ट्र भक्ति, समाज के प्रति संवेदनशीलता , राष्ट्र निर्माण एवं सामाजिक बुराईयों को खत्म करने का भाव हर समय जागृति हो। इस कार्य को करने के लिये हम निम्नलिखित कार्यक्रम कर सकते हैं।
1.    समय समय पर विभिन्न महापुरुषों की जयंती बहुत ही प्रभावशाली तरीके से मनाना जिससे की उस कार्यक्रम में सम्मिलित लोग पूर्ण रूप से प्रभावित हो और उनसे ऐसा भाव पैदा हो कि हमारे रंगों में इन महापुरुषों का रक्त प्रवाहित हो रहा हो और हम इनकी संतान हैं तथा हमें वह सभी काम करने चाहिये जो इन महापुरुषों ने किये, समय को परिस्थितियों को देखते हुए।
2.    सम सामाजिक विषयों पर परिचर्चा संबंधित विषय के विषेषज्ञों को बुलाकर।
3.    किसी सामाजिक विषय पर संगोष्ठी एवं सेमिनार।
4.    सामाजिक एवं संवेदनशील  विषयों पर नाटक का मंचन।
5.    प्रेरणादायक, करुणापूर्ण शिक्षाप्रद चलचित्र दिखा कर संस्कार देना।
6.    समाज सेवा के लिये नवयुवकों को समाज में ले जाकर सामाजिक काम करना।
7.    विभिन्न बीमारियों के निवारण,उपचार एवं रोकथाम के लिये स्वास्थ्य शिविर लगाना।
8.    सामाजिक, पारिवारिक, राष्ट्रीय एवं व्यवसायिक सोच रखने वाले पेशेवर व्यक्तित्व को बुलाकर व्याख्यान एवं प्रशिक्षण  शिविर लगवाना।
9.    सांस्कृतिक कार्यक्रम जैसे गीत संगीत, नाटक, समूह एवं एकल नृत्य, रंगोली, पोस्टर, वाद-विवाद, निबन्ध, ग्रुप डिस्कशन, रोल प्ले, आदि आदि कार्यक्रम लगातार करते रहना।
10.   खेल-कूद, व्यायाम, भाग-दौड़ आदि कार्यक्रम।
11.   एनसीसी या एनएसएस या स्काउट संस्था को आमंत्रित कर उनके कार्यक्रम करवाना।
इन सब कार्यक्रमों में युवा अपनी रुचि के अनुसार प्रतिभागी बने, यह सुनिश्चित  करें कि हर युवा एक या दो गतिविधियों में जरूर प्रतिभागी बने जिससे उसका सर्वांगीण विकास सुनिश्चित होगा। प्राथमिकता के स्तर पर हमें कौन से युवाओं को उठाना चाहिये जिस पर सबसे पहले काम शुरू होना चाहिये तो वह है गाँवों से ताल्लुक रखने वाले गरीब एवं उपेक्षित वर्ग के नौजवान सुदूर इलाकों में रहने वाले युवा कहने का मतलब है ऐसे युवाओं को शिक्षित एवं प्रगतिशील करना जिन तक कोई नहीं पहुँचता हो।
‘Reaching to un reached’ and Serving Poorest of the Poor Section of Society  यह होना चाहिये मूल मंत्र। यदि हम पूरी इमानदारी से पूरी प्रमाणिकता से इस मिशन पर काम करेंगे तो समाज एवं राष्ट्र को जिम्मेदार नागरिक के रूप में युवा देंगे। वे ऐसे युवा होंगे जोआत्मविश्वास , आत्म निर्भरता, निपुण, अनुशासन, जिम्मेदारी, सामाजिक संवेदनशीलता, राष्ट्रभक्ति के भाव से भरे होंगे। जहाँ जायेंगे सफल होंगे और अपनी छाप छोड़ेंगे। उससे बनेगा एक संवेदनशील  एवं संस्कारी घर-परिवार एवं समाज और उससे बनेगा सुदृढ़ राष्ट्र। पर इस महान कार्य को करने के लिये हमें बनाने होंगे अच्छे अध्यापक इसके लिये उनका ठीक से चयन करना होगा। उन्हें ठीक से प्रशिक्षित करना होगा और उन्हें ठीक से प्रोत्साहित करना होगा। जब तक अच्छा अध्यापक नहीं होगा, बच्चा अच्छा नहीं हो सकता यह जान लिजिये। अच्छा अध्यापक होगा, प्रोत्साहन, आत्मनिर्भरता एवं उचित पुरस्कार से तो आइये समाज एवं राष्ट्र निर्माण में अपना सहयोग दीजिये और लग जाइये अच्छा युवा एवं अच्छा अध्यापक बनाने में।

जय भारत, जय हिन्द!