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Friday, 20 November 2015

सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की एक मजबूत नींव रखते हुए डॉ अशोक कुमार गदिया

शशांक द्विवेदी
डिप्टी डायरेक्टर (रिसर्च), मेवाड़ यूनिवर्सिटी 
पिछले कुछ ही महीनें पहले मेवाड़ यूनिवर्सिटी ज्वाइन किया ,जब यहाँ आया तो बहुत सारी शंकाएं और आशंकाएं मन में थी लेकिन मेवाड़ में रहते हुए जब मैंने यहाँ का माहौल देखा तो हतप्रभ रह गया ,सच कहें तो यह देश में एकमात्र ऐसा विश्वविद्यालय है जहाँ आधुनिकतम पढाई के साथ साथ देश की संस्कृति के दर्शन होते है .यहाँ देश के लिए अपना महत्वपूर्ण योगदान देने वाले महापुरुषों की जयंती नियमित तौर से पूरे हर्षोल्लास के साथ मनाई जाती है ,साथ में इन महापुरुषों के पद चिन्हों पर चलने के लिए बच्चों को प्रेरित किया जाता है .हर महीनें देश और समाज से जुड़े हुए किसी महत्वपूर्ण मुद्दे पर विचार गोष्ठी का आयोजन होता है .लेकिन यह सब संभव हो पा रहा है यहाँ के राष्ट्रवादी चेयरमैन डॉ अशोक कुमार गदिया के कुशल नेतृत्व की वजह से ,उनकी दूरदर्शी सोच की वजह से .आज के दौर में जब देश के अधिकांश संस्थान /विश्वविद्यालय सिर्फ अपना आर्थिक हित साधने में लगे हुए है वही डॉ अशोक जी में अपने संस्थान /विश्विद्यालय में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की एक मजबूत नीव रख दी जो आज के नौजवानों के साथ साथ देश के युवा पीढ़ी को प्रेरणा देती रहेगी .लेकिन डॉ गदिया का ये सफ़र इतना आसान नहीं रहा या यह कहें की आसान नहीं है लेकिन वो तमाम मुश्किलों के बीच भी डटें है मैदान में ..तमाम समस्यायों के साथ भी मुस्करातें हुए मिलते है .आज के हालात में सरकारी से लेकर गैर सरकारी तक तमाम कोशिशें/साजिशें  हो चुकी है उन्हें गिराने की/परेशान करने की लेकिन फिर भी वो इन सबका मुकाबला करने को मैदान में खड़े है .डॉ गदिया का साफ कहना है कि इस देश और समाज के लिए मैं अपने विजन ,मिशन और लक्ष्य के प्रति पूरी तरह से समर्पित हूँ  और उससे तनिक भी डिगने वाला नहीं हूँ .उनकी यही जिजीविषा मेवाड़ विश्वविद्यालय की सबसे बड़ी ताकत है ,पूंजी है .संस्थान के लिए उनकी मेहनत और लगन की जितनी तारीफ़ की जाए उतनी कम है, कल 19 नवम्बर को संस्थान में रानी लक्ष्मी बाई की जयन्ती बहुत धूमधाम से मनाई गयी ,उसी दौरान डॉ गदिया ने  वर्तमान भारत को जोड़ते हुए रानी लक्ष्मी बाई पर बहुत शानदार और प्रेरणादायक भाषण दिया .एकदम नवीनतम तथ्यों के साथ ऐसा भाषण/विचार मैंने अभी तक की अपनी जिंदगी में तो नहीं सुना .उन्होंने अपने भाषण में देश की वर्तमान स्तिथि पर भी बहुत वाजिब सवाल उठाते हुए कहा कि पिछले 35 सालो में भारत अपने किसी भी पडोसी के साथ अपने संबंध ठीक नहीं कर पाया .इसी वजह से आज हम विकास की दौड़ में बहुत पीछे रह गए .उन्होंने यह भी कहा कि देश के राजनीतिक नेतृत्व के अपने स्वार्थ और अदूरदर्शिता की वजह से भारत भविष्य में फिर से गुलाम हो सकता है .क्योकि हमारे देश के पास हर क्षेत्र में पर्याप्त संसाधन होते हुए भी हम कोई भी पालिसी ठीक से नहीं बना पा रहें है .उन्होंने अपने वक्तव्य में और भी बहुत सी बातें रखी जो एकदम नई थी और मै पहली बार सुन रहा था . संस्थान में होने वाली हर जयंती और विचार गोष्ठी में डॉ गदिया को सुनना मुझे व्यक्तिगत तौर पर बहुत दिलचस्प और प्रेरणादायक लगता है क्योकि उनके विचारों से खुद मुझे नई दिशा मिलती है .  सच बात तो यह है कि मुझे उनके साथ काम करने का जो सौभाग्य मिल रहा है इसे मै सिर्फ ईश्वरीय अनुकम्पा मानता हूँ और हमेशा सोचता हूँ कि डॉ गदिया के विजन और मिशन के लिए मै अपने पूरे समर्पित भाव से काम करू .


Wednesday, 14 October 2015

इंजीनियरिंग छात्रों को अब पढ़ाई के दौरान ही मिलेगी प्रेक्टिकल ट्रेनिंग

शशांक द्विवेदी
डिप्टी डायरेक्टर (रिसर्च), मेवाड़ यूनिवर्सिटी, चितौड़गढ (राजस्थान )

इंडस्ट्री को चाहिए प्रशिक्षित स्नातक 

प्रशिक्षण का सीधा संबंध रोजगार से

इंजीनियरिंग छात्रों को अब तकनीकी शिक्षा के साथ-साथ इंडस्ट्री में उसकी प्रेक्टिकल ट्रेनिंग भी मिलेगी। देश में इसकी पहल मेवाड़ विश्वविद्यालय करने जा रहा है .मेवाड़ विश्वविद्यालय अपने कैम्पस में छात्रों को पढाई के साथ साथ इंडस्ट्री के साथ जोड़ने का प्लान बना रही है .इसमें विश्वविद्यालय के छात्र कंपनियों के क्लाइंट्स से सीधे संपर्क स्थापित करेगें और प्रोजेक्ट के माध्यम से उनकी समस्यायों का निराकरण करेगे ।इससे छात्रों की बौद्धिक क्षमता ,प्रखरता और मौलिकता में वृद्धि होगी ।

भारत को सुपरपावर बनाने के लिए वर्तमान में इस बात की जरूरत है कि इंडस्ट्री और इंस्टीट्यूट एक धरातल पर काम करे ।पिछले दिनों इन्फोसिस के संस्थापक और आई टी दिग्गज नारायणमूर्ति ने कहा था कि सूचना प्रौद्योगिकी इंडस्ट्री को प्रशिक्षित इंजिनियर नहीं मिलते । आज जरुरत इस बात की है कि इंजीनियरिंग छात्रों को प्रेक्टिकल नॉलेज मिले और इंडस्ट्री की जरुरत के हिसाब से अपडेट थ्योरी। इससे इंडस्ट्री को प्रशिक्षित स्नातक मिलेगे  इसी बात को ध्यान में रखते हुए मेवाड़ विश्वविद्यालय ने छात्रों को पढाई के साथ साथ इंडस्ट्री के साथ जोड़ने का फैसला किया है . देश की इंडस्ट्रीज में कुशल मानव संसाधन की भारी कमी है। इस योजना से वह कमी भी दूर होगी। असल में ये सुविधा अभी मेडिकल क्षेत्र में ही है कि छात्र वहां पढ़ाई के दौरान प्रेक्टिकल ज्ञान भी प्राप्त कर लेता है।
तकनीकी शिक्षा प्राप्त करने वाले छात्रों को यह सुविधा नहीं है। इस पहल से तकनीकी शिक्षा प्राप्त करने वाले छात्रों को पढ़ाई के साथ-साथ इंडस्ट्री में जाकर प्रेक्टिकल ज्ञान प्राप्त कर सकेगा। इंजीनियरिंग कॉलेजों का इंडस्ट्री से अटैचमेंट जरूरी है। इससे जीडीपी (औद्योगिक विकास दर) बढ़ेगी और देश सुपर पावर बनेगा।

मेवाड़ विश्वविद्यालय के चेयरमैन डॉ अशोक कुमार गदिया  ने कहा कि इंस्टीट्यूट और इंडस्ट्री के बीच दूरी कम होना जरूरी है। छात्रों की ऊर्जा को इस फील्ड में लगाना है। विश्वविद्यालय की ओर से ट्रेनिंग की सुविधा दी जाएगी। इस सम्बन्ध में जरुरी सारी औपचारिकतायें पूरी की जा चुकी है । इससे तकनीकी शिक्षा प्राप्त कर रहे छात्रों की प्रतिभा का उपयोग होगा। एजुकेशनल सिस्टम में कोर्सेज का आधुनिकीकरण जरूरी है।क्योकि आज हमारे शैक्षिक कोर्स 20 साल पुराने है ,इसलिए इंडस्ट्री के हिसाब से छात्रों को प्रशिक्षण बहुत जरुरी है । बिना इसके आज नौकरी पाना सबसे बड़ा चुनौतीपूर्ण कार्य होता जा रहा है ।


सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में 
सूचना प्रौद्योगिकी के इस युग में प्रोडक्शन और डेवलपमेंट के क्षेत्र में  इंजीनियरों की मांग एकदम से बढ़ी है। लेकिन यह भी सच है कि आईटी शिक्षा प्राप्त करने वाले अधिकतर प्रशिक्षुओं को इसके बारे में कोई जानकारी ही नहीं है। प्रोडक्शन और डेवलपमेंट के क्षेत्र में  ट्रेनिंग  करने के तुरंत बाद कम्प्यूटर निर्माण, एसेम्बलिंग करने वाली राष्ट्रीय/बहुराष्ट्रीय कंपनियों में अच्छे ऑफर मिलने लगते हैं। आजकल कंप्यूटर निर्माण करने वाली कंपनियां प्रशिक्षित  इंजीनियरों को ही ऊंचे वेतनमान पर तुरंत रोजगार दे रही हैं। आज संपूर्ण आईटी उद्योग सच माइने में प्रोडक्शन और डेवलपमेंट इंजीनियर की कार्य-कुशलता पर ही टिका हुआ है।
विश्वविद्यालय द्वारा आईटी क्षेत्र की बेहतरीन कंपनियों के सहयोग से ट्रेनिग और लाइव प्रोजेक्ट ट्रेनिंग  करने के बाद , इंजीनियरिंग स्नातक होने के बाद शुरूआती वेतन पन्द्रह  से बीस  हजार से शुरू होकर कुछ ही माह में अनुभवानुसार 30,000 रूपए तक आसानी से पहुंच जाता है। बहुराष्ट्रीय कंपनियों में वेतन की कोई सीमा नहीं है। बशर्ते योग्यता व अनुभव हो। कोर्स के अंतिम चरण में छात्रों को साक्षात्कार की तैयारी करने एवं नौकरी खोजने के तौर तरीकों से भी अवगत कराया जाता है। इसमें छात्रों को अपनी मैनेजरियल स्किल के साथ सोशल सेंसिटिविटी में भी खरा उतरना होगा। इस ट्रेनिंग कोर्स में छात्रों को आईटी और सॉफ्टवेयर से संबंधित विषयों की ट्रेनिंग दी जाती है, जैसे प्रोग्रामिंग लैंग्वेज, डाटाबेस, नेटवर्किंग, ऑपरेटिंग सिस्टम आदि। अंतिम सेमेस्टर में छात्रों को इंडस्ट्रियल टे्रनिंग के रूप में प्रोजेक्ट वर्क भी करना होता है, ताकि उन्हें सॉफ्टवेयर इंडस्ट्री की कार्य-प्रणाली का वास्तविक अनुभव हो सके। बाद में जॉब के दौरान इस अनुभव का काफी फायदा मिलता है। आज हर फील्ड में कंप्यूटर की जरूरत बनी हुई है, जहां आवश्यकता के अनुसार नए-नए सॉफ्टवेयर की मांग बनी रहती है। ऐसे में आईटी सेक्टर में अपार संभावनाए बनी हुई हैं। इसलिए वर्तमान माहौल में इस फील्ड में सफलता के लिए उचित प्रशिक्षण की महती आवश्यकता है । क्योकि प्रशिक्षण का सीधा संबंध रोजगार से है। भारतीय सॉफ्टवेयर प्रोफेशनलों का लोहा पूरी दुनिया मानती है। क्लाउड कम्पुटिंग आपको एक ऐसा प्लेटफॉर्म उपलब्ध कराता है, जिसके बाद आप आईटी की दुनिया में अपना बेहतर मुकाम बना सकते हैं। अच्छा कैरियर विकास, बेहतर सैलरी पैकेज, रोजगार की असीम संभावनाओं जैसी कई खूबियां क्लाउड कम्पुटिंग के साथ जुड़ी हैं। यह सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में नयी फील्ड है इस कारण इस कोर्स का युवाओं में काफी क्रेज है।

मेवाड़ विश्वविद्यालय के चेयरमैन डॉ अशोक कुमार गदिया  के अनुसार इंजीनियरिंग की शिक्षा ग्रहण करने वाले विद्यार्थी कल के देश निर्माता है और भविष्य की जरूरतों को पूरा करने का दायित्व भी इन्ही इंजीनियरों पर होगा। हम सबका दायित्व है कि ऐसे भावी इंजीनियरों को ऐसी शिक्षा मिले की वह अपने जीवन में न केवल देश को वरन विश्व को भी नई राह दिखा सके और आने वाली चुनौतियों का निराकरण भी कर सके। इसी उद्देश्य को लेकर मेवाड़ विश्वविद्यालय में इंजीनियरिंग की शिक्षा उपलब्ध कराई जा रही है और छात्रों को उत्कृष्ट शिक्षा देने के लिए आधुनिक यंत्रों उपकरणों के माध्यम से प्रायोगिक शिक्षा देने का प्रयास किया जा रहा है जिससे इंजीनियरिंग छात्रों की जिज्ञासा बलवती हो सके।

इस तरह के प्रशिक्षण से उच्च शैक्षिक कार्य ,प्रशिक्षण और शोध कार्यों के मध्य समन्वय स्तापित हो सकेगा । साथ ही इंडस्ट्री और विश्वविद्यालय के मध्य एक कॉमन प्लेटफार्म स्थापित करना है ।जिससे विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों को अंतर्राष्ट्रीय स्तर के औद्योगिक विशेषज्ञों के निर्देशन में प्रशिक्षण लेने का मौका मिलेगा ।साथ ही इंडस्ट्रीज को प्रशिक्षित और कुशल इंजिनियर मिल सकेगे ।जो इंडस्ट्री की मांग के अनुसार काम कर सकेगे ।
स्किल डेवलपमेंट 
छात्रों में स्किल डेवलपमेंट के द्वारा छात्रों की प्रतिभा और दक्षता (अपग्रेड )को बढ़ा सकती है । इस प्रकार का सम्पूर्ण प्रयास विद्यार्थियो के सपनो को साकार करने में सफल साबित होगा । जिससे छात्रों के भविष्य में रोजगार की भावनाये प्रबल हो सकेगी ।

पढाई के साथ साथ प्रशिक्षण
पढाई के साथ साथ प्रशिक्षण हो तो यह और भी अच्छा  है। वैसे भी पढाई-लिखाई आजकल इतनी महंगी हो चुकी है कि कुछ ऐसे तरकीब तो ढूंढने ही होंगे जिससे अभिभावकों का दबाव कम हो। इसे देखते हुए इंजीनियरिंग छात्र अपनी पढ़ाई के साथ-साथ घर बैठे आईटी के बड़े प्रोजेक्ट्स डील कर रहे हैं। इन प्रोजेक्ट्स के लिए कंपनियां उन्हें अच्छा खासा स्टाइपेंड भी दे रही हैं। छात्र भले ही फिर वह घर बैठकर काम करें या कॉलेज में बैठकर।
परीक्षा के समय में छात्र इन प्रोजेक्ट को रोक भी सकते हैं और बाद में काम शुरू कर सकते हैं। यह नया चलन आईटी इंजीनियरिंग के छात्रों को बहुत पसंद आ रहा है। आने वाले समय में इसे और सही रूप देने की कोशिश चल रही है छात्रों को आईटी के इन प्रोजेक्ट्स पर काम करने के लिए सीधे क्लाइंट्स से इंटरेक्शन कराया जायेगा  । इसमें वेब डिजाइनिंग, वेब अपडेटिंग, कंटेंट राइटिंग, सॉफ्टवेयर डवलपिंग और मार्केट सर्वे जैसे काम खास हैं। कंपनियां ऐसे तकनीकी कामों के लिए छात्रों की डिग्री और अंक से यादा उनकी व्यावहारिक कामों को तवजो दे रही हैं। फिलहाल इस तरह के प्रोजेक्ट केपीओ (नॉलेज प्रोसेस आउटसोर्सिग) की ओर से दिए जा रहे हैं। इस केपीओ के लिए छात्रों को ट्रेनिंग देने का काम वर्चुअल प्रोजेक्ट्स के जरिए ही किया जा रहा है।

इस काम से छात्रों को उद्योगों की जरूरतें जानने को मिल रही हैं और उनका अनुभव भी बढ़ रहा है। कितनी अच्छी बात है कि पढ रहे युवाओं को पैसा और अनुभव के साथ-साथ कंपनियों व उद्योग-धंधों का एक्पोजर मिल रहा है। स्टूडेंट को डिग्री के बाद और डिग्री के दौरान ट्रेनिंग के लिए बड़ी संख्या में विकल्प मिलेंगे। स्टूडेंट प्रेक्टिकल नॉलेज ले पाएंगे और खुद को इंडस्ट्री की जरूरत के मुताबिक तैयार कर पाएंगे। स्टूडेंट्स की पढ़ाई में जो कमी रह जाती है, वो फील्ड में पूरी हो सकेगी

Monday, 20 July 2015

J&K students fall prey to NDA government’s apathy

Shashank Dwivedi
The red-tapism and indifference of UGC and AICTE mar the future of poor Kashmiri students

Despite PDP President Mehbooba Mufti raising the issue in Parliament of the Central government’s lackadaisical approach to the special scholarship scheme for the J&K students, the government and its bodies such as UGC and AICTE have not woken up to the seriousness of the matter.  The MPs of J&K have also raised the matter in Parliament, but to no avail. The issue has been hanging in the air despite the NDA being in power both at the center and the state of J&K.
The UPA government at the Center had taken a decision five years ago to enable the poor students of J&K to move outside the state in order to offer them a better opportunity in terms of education, training and employment. Accordingly, it was decided to send at least 5000 students every year for higher education outside the state. The number of students planned to be covered was 25,000 in five years. J&K students were to choose their courses, institutes/colleges or universities under this scheme, and the Center (MHRD) was to bear all expenses for their education as well as boarding and lodging. The Central government allocated a sum of Rs 1200 crores to the MHRD for this purpose. The Secretary, MHRD, formed a committee (Inter Ministerial Committee – IMC) to monitor it and its implementation was handed over to the AICTE. The scheme was called the PMSSS for J&K students.
The scheme started in 2011-12, and the following table gives the number of students who moved outside their state for education:
Session
Number of Students
2011-12
38
2012-13
3562
2013-14
3747
2014-15
2102

The scheme provided 250 seats for Medical, 250 seats for Engineering and the remaining 4500 seats for other courses.
The objective behind the PMSS was clear: to send 5000 J&K students every year outside the state in order to receive technical and higher education and to bring them into the national mainstream. The scheme offered a golden opportunity to the students of J&K to receive career oriented education and training in other states of India. The PMSS scheme provided for students educational fees as well as their board and lodging.  The students had the freedom to choose government recognized institutions and universities. After taking admission in the institution/university of their choice, the students were required to inform the government accordingly.
Hopes dashed: Scholarship holders (from left) Aquib Hussain from Anantnag; Musai Ahmad Wani from Sopore; Umer from Srinagar and Zubair Ahmed from Baramulla applied for admission to various colleges across the country but had to return home disappointed.


The scheme took off very well initially for two to three years. The AICTE acted as the nodal agency for implementing Prime Minister’s Special Scholarship Scheme for J&K students. However, as it usually happens with government schemes, this noble scheme has also now fallen victim to bureaucratic manipulations and interpretations. Till 2013-14, under the referred scheme students got admission in Institutions of their Choice. For the Session 2014-15, the AICTE, departing from its earlier practice, started forcing students to take admission in certain Institutions identified by the AICTE.
 As a result, in 2014-15, AICTE provided scholarships to only 250 students, with 4750 seats remaining vacant. In 2014-15, 75% students got scholarship, whereas the remaining 25% are yet to receive their scholarship. These 25% students are facing a tough situation as the institutions where they are studying are demanding their fees, which the poor students are unable to pay as they have not received their scholarships.
Various anomalies can be pointed out in the way the AICTE has been implementing this scheme. In May, 2014, the AICTE invited willingness from Institutions prepared to offer seats under this Scheme within the number sanctioned by it for the intake in 2014-15, without mentioning any condition or special qualification for any Institution in the notification. Pursuant to this, Institutions submitted their willingness. However, the AICTE did not publish the list of Institutions that submitted willingness in accordance with the advertisement. Suddenly, the MHRD announced that each institution will get only two students. So overall, the guidelines of the MHRD, AICTE and UGC appear contradictory and aimed at defeating the noble objectives of the scheme.
Due to the complex process adopted by the MHRD, UGC and AICTE, very few students of J&K will be able to register, and there are plans to end this program from the coming session. The UPA government has made provisions for five years for the PMSS to bring Kashmiri students to the national mainstream, but the NDA government does not seem inclined to continue with the scheme. Most of the students deriving benefits under the PMSS scheme are from rural and poor background, coming from far flung areas. Many of them are girl students, too. Our Prime Minister’s vision is to provide girl students a special place in our society, as evident from many of his actions and declarations. However, it is an irony that the PMSS scheme which would have given the poor J&K girls pride of place in our society is gasping for breath due to some bureaucrats’ callous attitude. Many of these students are not willing to continue their education in these Institutions under the existing circumstances. The students feel bad that they are unable to pay for their education as well as board and lodging in the institutions where they are studying.
Some educational institutions have been bearing the cost of education as well as board and lodging of the students of J&K for the last two years, following all the rules and regulations laid down by the government. However, since they happened to be from the private sector, the government seems disinclined to extend assistance to them. These institutions were providing the J&K students with modern, employment-oriented education that is steeped in nationalistic values and commitment to the society. The J&K students receiving education in these institutions got to know the students of other parts of India, their food and culture. They were gradually being assimilated into the national mainstream via education and acculturation.
It is apparent that the NDA government is not keen to continue with the noble PMSS scheme which aimed at bringing the students of J&K into the national mainstream via proper education and acculturation through mixing with students of other states. The MHRD, UGC and AICTE have together turned PMSS into a frustrating ordeal for J&K students.
 The worrying factor is that in the absence of educational opportunities provided under the PMSS outside J&K, the frustrated youth might disembark from the path of nationalism and follow in the footsteps of misguided youths of their state. All the good work done in the last few years to make J&K students aware of their nation, its culture, history and real patriots will go waste if the scheme is aborted midway.
                                                                                               

Sunday, 5 July 2015

सरकारी उपेक्षा के शिकार जम्मू-कश्मीर के बच्चे

शशांक द्विवेदी
डिप्टी डायरेक्टर (रिसर्च), मेवाड़ यूनिवर्सिटी

यूजीसी और एआईसीटीई की लालफीताशाही का शिकार जम्मू-कश्मीर के गरीब बच्चें
Daily News
पिछले दिनों संसद में पीडीपी अध्यक्ष महबूबा मुफ्ती ने जम्मू –कश्मीर के बच्चों की विशेष स्कॉलरशिप योजना पर उदासीनता बरतने के लिए केंद्र सरकार की खिचाई करते हुए इससे सम्बंधित सवाल उठाया था ।  महबूबा मुफ्ती के अलावा जम्मू –कश्मीर के सांसदों ने भी इस मुद्दे को सदन में कई बार उठाया लेकिन केंद्र सरकार ने शिक्षा से जुड़े इतने महत्वपूर्ण मुद्दे पर अब तक कोई ठोस पहल नहीं की है न कोई संजीदगी दिखाई है ।  जबकि केंद्र और राज्य दोनों जगह ही एनडीए की सरकार है ।


असल में यूपीए सरकार ने 5  साल पहले जम्मू-कश्मीर के गरीब बच्चों की शिक्षा के लिए एक योजना शुरू की थी जिसके तहत वो देशभर में कहीं भी अपनी शिक्षा प्राप्त कर सकते थे .इसमें  प्रधानमंत्री विशेष स्कॉलरशिप योजना के तहत प्रतिवर्ष 5000 छात्रों को स्कॉलरशिप दी जानी थी। जिसमें 250 इंजीनियरिंग , 250 मेडिकल तथा अन्य कोर्सेस के लिये 4500 सीटें उपलब्ध थीं  । इस योजना के लिए यूपीए सरकार द्वारा 1200 करोड़ रुपये का बजट भी स्वीकृत किया गया था । जिसका उद्देश्य साफ था कि प्रतिवर्ष जम्मू एवं कश्मीर से 5000 गरीब छात्र-छात्राएं प्रदेश से बाहर जाकर उच्च शिक्षा प्राप्त करें ताकि उन्हें राष्ट्र की मुख्यधारा में लाया जा सके।सरकार ने  गरीब बच्चों को राज्य से बाहर आकर अन्य राज्यों में पढ़ने-लिखने और प्रशिक्षण प्राप्त कर उचित रोजगार पाने का सुनहरा अवसर प्रदान किया था।  इस विशेष स्कॉलरशिप योजना के तहत इसमें बच्चों का रहना, खाना एवं उनके पढ़ने की फीस शामिल थी। ऐसी सुविधा थी कि बच्चे अपनी मर्जी से मान्यता प्राप्त महाविद्यालय या विश्वविद्यालय चुनें । अपनी मर्जी के चुनिंदा कोर्स में पढ़ाई करें और अपने पढ़ने की सूचना सरकार को दें। यह सिलसिला वर्ष 2011-12 से प्रारम्भ हुआ। 2011-12 में 37, 2012-13में 3561, 2013-14 में 3700 बच्चें जम्मू कश्मीर से निकले और उन्होंने देश के विभिन्न शिक्षण संस्थानों में प्रवेश लिया . योजना की निगरानी हेतु मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने एक समिति बनाई और उसके  क्रियान्वन का काम एआईसीटीई को दिया गया। मगर दुर्भाग्य से दोनों ने मिलकर ऐसे नियम बनाये कि फिलहाल यह योजना नियमों में ही फंसकर रह गयी। इसका मूल उद्देश्य ही खो गया। और अब तो इसे ख़त्म करने की कोशिश भी की जा रही है . शुरू के 2-3 साल तो यह योजना ठीक ठाक चली लेकिन बाद में यह सरकारी लालफीताशाही का शिकार होकर नियम –कानूनों में ही फंसकर रह गई  .हाल यह हुआ कि 2014-15     में एआईसीटीई द्वारासिर्फ  250 सीटों पर   स्कॉलरशिप दी गई जबकि बाकी    4750 सीटें खाली रह गईं।  कुछ बच्चों ने एआईसीटीई में पंजीकरण कराकर अपने स्तर पर कॉलेज ढूंढे और उनमें अध्ययन कर रहे हैं। जिन्हें सरकार अब स्कॉलरशिप नहीं दे रही । वर्ष 2013-14 में 75 प्रतिशत बच्चों की स्कॉलरशिप मिल गयी। मगर बाकी बचे  25 प्रतिशत बच्चों को अभी तक सरकार ने स्कॉलरशिप नहीं दी है। बच्चों का कोई दोष न होते हुए भी वे दरहै-दर की ठोकरें खा रहे हैं। शिक्षण संस्थान, जहां वे पढ़ रहे हैं उनसे पैसा मांग रहे हैं। वे गरीब हैं पैसा दे नहीं सकते। लेकिन अब वे कहाँ जाएँ ?ये एक बड़ा सवाल है और इसका जवाब फिलहाल किसी के पास नहीं है .
ABP News
सत्र 2014-15 में मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने इस योजना के लिए इतनी जटिल प्रक्रिया अपनायी कि कोई बच्चा जम्मू –कश्मीर से बाहर पढ़ने ही न जा न पाये।  हालत यह हो गए की 5000 में से सिर्फ 250 ही एआईसीटीई की तरफ से पंजीकृत हो पाए । दुसरी तरफ मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने ही उन संस्थानों का आह्वान किया जो जम्मू-कश्मीर के बच्चों को स्कॉलरशिप स्कीम में पढ़ाना चाहते हैं जिसके लिए लगभग 250 संस्थानों ने आवेदन किया। अब 5000 बच्चों की वरीयता सूची बनाकर इन संस्थानों में बच्चों की मर्जी से उनका दाखिला करना था। किन्तु ऐसा नहीं किया गया। अचानक एक नई प्रक्रिया को लागू किया गया। इसमें यह तय किया गया कि प्रत्येक संस्था को दो बच्चे दिये जायेंगे। कुलमिलाकर मानव संसाधन विकास मंत्रालय ,यूजीसी ,एआईसीटीई की गाइडलाइंस ही विरोधाभाषी है ।
Dainik Jagran
 सच्चाई यह है की केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी योजना को यूजीसी और एआईसीटीई के ही कुछ बड़े अधिकारी पलीता लागने की फिराक में हैं। उन्हें ऐसा करने से रोका जाना चाहिये और इसके लिए स्पष्ट नीति होनी चाहिए  वर्ष 2014-15 में जानबूझकर लगाये बन्धन खत्म कर जो बच्चा जहां पढ़ रहा है, वहीं पढ़ने दिया जाये। उसे स्कॉलरशिप भी दी जाये। अन्यथा जम्मू-कश्मीर में अब तक जैसा होता आया है, वैसा ही होने का खतरा बढ़ जाएगा। नई युवा पीढ़ी के गलत हाथों में चले जाने की प्रबल संभावना है।  कुछ निजी संस्थान तो पिछले 2 वर्षों से कश्मीर के सैकड़ों छात्रों को अपनें यहाँ बिना फीस लिए पढ़ा भी रहें है और उनके रहने –खानें का खर्च भी खुद वहन कर रहे है । लेकिन वे निजी क्षेत्र से है इसलिए सरकार उनकी मदत नहीं करना चाहती ना ही उन बच्चों को  स्कालरशिप ही अब तक मिली है जबकि वो सभी नियम –कानूनों के तहत यहाँ आयें है और वो इसके पात्र है ।इस योजना की सबसे अच्छी बात यह थी की जम्मू –कश्मीर के युवा आतंकवाद को अपने जेहन से निकालकर शिक्षा के लिए देश के कई हिस्सों में जा रहे थे ।  भारत के अन्य हिस्सों में आकर हिन्दुस्तान के बारे में इनकी अच्छी समझ पैदा हुई । उन्होंने बाकी हिंदुस्तान का वातावरण देखा, यहां के रीति रिवाज देखे, यहां का खान-पान देखा, लोगों से मिले और विचारों का आदान प्रदान हुआ ।  इन युवाओं ने कश्मीर और भारत को एक करके देखा ,भारत की संस्कृति एवं देश के महापुरुषों को जाना समझा ।  क्योकि शिक्षा ही सकारात्मक सोच का जरिया है और ऐसे प्रयासों से ही कश्मीर के युवाओं का अलगाव खत्म होगा  ।
Deshbandhu
लेकिन सरकारी उपेक्षा के शिकार हुए इन गरीब बच्चों को अगर समय रहते राहत न मिली तो ठीक नही होगा खासतौर से उन गरीब लड़कियों को जो अपने सुनहरे भविष्य का सपना आंखों में लिये अपने घरों से कई सौ किलोमीटर दूर देश के विभिन्न कालेजों में दिन-रात पढ़ाई करने में जुटी हैं। उनकी आंखों में अपने गरीब मां-बाप के सपने पूरे करने का चमकीला अरमान पल रहा है। देश व समाज में व्याप्त बुराइयों को दूर करने का जज्बा हिलोरें ले रहा है।  जम्मू-कश्मीर के अधिकांश बच्चों ने तो जम्मू-कश्मीर से बाहर आकर अन्य राज्यों में इसलिये पढना कबूल किया कि उनके परिवार के दिन बहुरेंगे। उनके प्रदेश में खुशहाली फिर लौटेगी। पढ़ाई करने के बाद वे देश व समाज की अगवानी करेंगे। लेकिन केन्द्र सरकार से उन्हें सहायता न मिली तो वे नौजवान कहां जाएंगे। शायद उन्हें फिर आतंकवाद की अंधेरी और खतरनाक गुफा में घुसने को मजबूर होना पड़ेगा, जिससे बचकर वे अपना करियर बनाने निकले थे।

इस योजना में केंद्र सरकार की उपेक्षा से यह लगने लगा है कि शायद नई सरकार नहीं चाहती कि जम्मू-कश्मीर के गरीब बच्चे बाहर आकर पढ़ें एवं देश की मुख्यधारा में शामिल हों। बाहर आने वाले गरीब बच्चे मुख्य रूप से दूरदराज के गरीब मुसलमान परिवारों से हैं। लेकिन कश्मीरी छात्रों से जुड़े इतने संवेदनशील मुद्दे पर केंद्र सरकार संजीदा नहीं है ।   ऐसा लग रहा है की जम्मू-कश्मीर के बच्चों को शिक्षा के माध्यम से देश और समाज की मुख्यधारा में जोड़ने की इतनी अच्छी योजना भी यूजीसी एवं एआईसीटीई के अधिकारियों की लालफीताशाही से दम तोडती नजर आ रही है । 

Article link(pls click to see)

http://abpnews.abplive.in/ind/2015/07/03/article638805.ece/Jammu-Kashmir-Student

Friday, 3 July 2015

स्किल इंडिया की जरुरत

शशांक द्विवेदी
डिप्टी डायरेक्टर (रिसर्च), मेवाड़ यूनिवर्सिटी
National Duniya
 डिग्री और स्किल के बीच बढ़ता फ़ासला
संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष की  एक रिपोर्ट के अनुसार दुनियाँ भर में भारत सबसे बड़ी युवा आबादी वाला देश है कुल जनसंख्या के मामले में भारत , चीन से पीछे हैं, लेकिन 10 से 24 साल की उम्र के 35.6 करोड़ लोगों के साथ भारत सबसे अधिक युवा आबादी वाला देश है चीन 26.9 करोड़ की युवा आबादी के साथ दूसरे स्थान पर है इस मामले में भारत व चीन के बाद इंडोनेशिया (6.7 करोड़), अमेरिका (6.5 करोड़), पाकिस्तान (5.9 करोड़), नाइजीरिया (5.7 करोड़), ब्राजील 5.1 करोड़ व बांग्लादेश (4.8 करोड़) का स्थान आता है
Dainik Jagran
अब सवाल यह है की इतनी बड़ी युवा आबादी का भारत क्या सकारात्मक उपयोग कर पा रहा है क्योकि आंकड़ो के मुताबिक़ साल दर साल बेरोजगारी बढ़ रही है और देश में स्किल्ड युवाओं की भारी संख्या में कमी है । पिछलें दिनों सीआईआई की इंडिया स्किल रिपोर्ट-2015 के मुताबिक हर साल सवा करोड़ युवा रोजगार बाजार में आते हैं । आने वाले युवाओं  में से 37 प्रतिशत ही रोजगार के काबिल होते हैं। यह आंक़डा कम होनेके बावजूद पिछले साल के 33 प्रतिशत के आंक़डे से ज्यादा है और संकेत देता है कि युवाओं को स्किल देने की दिशा में धीमी गति से ही काम हो रहा है।एक दूसरी रिपोर्ट के अनुसार तो हर साल देश में 15 लाख इंजीनियर बनते है लेकिन उनमें से सिर्फ 4 लाख को ही नौकरी मिल पाती है बाकी सभी बेरोजगारी का दंश झलने को मजबूर है । नेशनल एसोशिएसन ऑफ सॉफ्टवेयर एंड सर्विसेज कंपनीज यानी नैसकाम के एक सर्वे के अनुसार  75 फीसदी टेक्निकल स्नातक नौकरी के लायक नहीं हैं। आईटी इंडस्ट्री इन इंजीनियरों को भर्ती करने के बाद ट्रेनिंग पर करीब एक अरब डॉलर खर्च करते हैं। इंडस्ट्री को उसकी जरुरत के हिसाब से इंजीनियरिंग ग्रेजुएट नहीं मिल पा रहें है । डिग्री और स्किल के बीच फासला बहुत बढ़ गया है । इतनी बड़ी मात्रा में पढ़े लिखे इंजीनियरिंग बेरोजगारों की संख्या देश की अर्थव्यवस्था और सामजिक स्थिरता के लिए भी ठीक नहीं है ।
क्यों जरुरी है स्किल डेवलपमेंट ?
असल में हमनें यह बात समझनें में बहुत देर कर दी की  अकादमिक शिक्षा की तरह ही बाजार की मांग के मुताबिक उच्च गुणवत्ता वाली स्किल की शिक्षा देनी भी जरूरी है। एशिया की आर्थिक महाशिक्त दक्षिण कोरिया ने स्किल डेवलपमेंट के मामले में चमत्कार कर दिखाया है और उसके चौंधिया देने वाले विकास के पीछे स्किल डेवलपमेंट का सबसे महत्वपूर्ण योगदान है। इस मामले में उसने जर्मनी को भी पीछे छोड़ दिया है। 1950 में दक्षिण कोरिया की विकास दर हमसे बेहतर नहीं थी। लेकिन इसके बादउसने स्किल विकास में निवेश करना शुरू किया। यही वजह है कि 1980 तक वह भारी उद्योगों का हब बन गया। उसके 95 प्रतिशत मजदूर स्किल्ड हैं या वोकेशनलीट्रेंड हैं, जबकि भारत में यह आंक़डा तीन प्रतिशत है। ऐसी हालत में भारत कैसे आर्थिक महाशिक्त बन सकता है ? स्किल इंडिया बनाने के उद्देश्य से मोदी सरकार ने अलग मंत्रालय बनाया है। नेशनल स्किल डेवलपमेंट मिशन भी बनाया गया है।केन्द्रीय बजट में भी इसके लिए अनुदान दिया गया है ।  मलतब पहली बार कोई केंद्र सरकार इ
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सके लिए इतनें संजीदगी से काम करने की कोशिश कर रही है । इसे देखते हुए लगता है कि स्किल डेवलपमेंट  को लेकर केंद्र सरकार की सोच और इरादा तो ठीक है लेकिन इसका कितना क्रियान्यवन हो पायेगा ये तो आने वाला समय ही बताएगा क्योकिं अभी तक स्किल डेवलपमेंट के लिए कोई ठोस काम नहीं हुआ है ना ही इसके कोई बड़े नतीजें आये है । जबकि तकनीकी और उच्च शिक्षा का यह सबसे जरुरी और महत्वपूर्ण पहलू है जो हर मायने में देश के विकास को प्रभावित करता है।बिना स्किल के और लगातार बेरोजगारी बढ़ने की वजह से इंजीनियरिंग कालेजों में बड़े पैमाने पर सीटें खाली रहने लगी है । उच्च और तकनीकी शिक्षा के वर्तमान सत्र में ही पूरे देशभर में 7 लाख से ज्यादा सीटें खाली है । इसने भारत में उच्च शिक्षा की शर्मनाक तस्वीर पेश की है । यह आंकड़ा चिंता बढ़ाने वाला भी है, क्योंकि स्थिति साल दर साल खराब ही होती जा रही है । एक तरफ प्रधानमंत्री देश के लिए मेक इन इंडिया की बात कर रहें है वही दूसरी तरफ देश में तकनीकी और उच्च शिक्षा के हालात बद्तर स्तिथि में है । ये हालात साल दर साल खराब होते जा रहें है । सच्चाई यह है कि देश के अधिकांश इंजीनियरिंग कॉलेज डिग्री बाँटने की दूकान बन कर रह गयें है ।इन कालेजों से निकलने वाले लाखों युवाओं के पास इंजीनियरिंग की डिग्री तो है लेकिन कोई कुछ भी कर पाने का स्किल नहीं है जिसकी वजह से देश भर में  हर साल लाखों लाखों इंजीनियर बेरोजगारी का दंश झेलने को मजबूर है ।
सरकार का सारा ध्यान सिर्फ कुछ सरकारी यूनिवर्सिटीज ,आईआईटी, आईआईएम् ,एनआईटी जैसे मुट्ठीभर सरकारी संस्थानों पर है जबकि देश भर में  95 प्रतिशत युवा निजी विश्वविद्यालयों और संस्थानों से शिक्षा लेकर निकलते है और सीधी सी बात है अगर इन 95 प्रतिशत छात्रों पर कोई संकट होगा तो वो पूरे देश की अर्थव्यवस्था के साथ साथ सामाजिक स्तिथि को भी नुकसान पहुंचाएगा सिर्फ 5 प्रतिशत सरकारी संस्थानों की बदौलत विकसित भारत का सपना साकार नहीं हो सकता उच्च शिक्षा में जो जो मौजूदा  संकट है उसे समझनें के लिए सबसे पहले इसकी संरचना को समझना होगा मसलन एक तरफ सरकारी संस्थान है दुसरी तरफ निजी संस्थान और विश्वविद्यालय है निजी संस्थानों भी दो तरह के है  एक वो है जो छात्रों को डिग्री के साथ साथ हुनर भी देते है जिससे वो रोजगार प्राप्त कर सकें ,ये संस्थान गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा देने के लिए प्रतिबद्ध है और उसके लिए लगातार प्रयास कर रहें है ,ये छात्रों के स्किल डेवलपमेंट पर ध्यान देते हुए उन्हें उच्च स्तर की ट्रेनिंग मुहैया करा रहें है वही दुसरी तरफ कई प्राइवेट यूनिवर्सिटी और संस्थान सिर्फ डिग्री देनें की दूकान बन कर रह गएँ है ये खुद न कुछ अच्छा करतें है बल्कि जो भी संस्थान बेहतर काम करनें की कोशिश करता है उसके खिलाफ काम करने लगते है ,साथ में अच्छे संस्थानों को बेवजह और झूठे तरीके से बदनाम करने की भी कोशिश की जाती है और इस काम में मीडिया का सहारा लेकर कई गलत ख़बरें और गलत तथ्य प्लांट किये जाते है जो की पेड़ मीडिया का एक हिस्सा है मसलन पिछले दिनों मीडिया में कुछ अच्छे और मशहूर निजी विश्वविद्यालयों के खिलाफ़ जानबूझकर ख़बरें प्लांट की गई जबकि ये सभी बहुत आला दर्जे के संस्थान है जो अपने अपने स्तर पर देश भर में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के लिए जाने जाते है ,ये सभी छात्रों के स्किल डेवलपमेंट पर विशेष ध्यान दे रहें है और सबसे बड़ी बात यह कि पिछले पाँच सालों में उच्च और तकनीकी शिक्षा में छाई इतनी मंदी के बाद भी इन संस्थानों और यूनीवर्सिटी में पर्याप्त संख्या में छात्र है एक तरह जहाँ देश के अधिकांश संस्थानों में लाखों की संख्या में सीटें खाली है वही दुसरी तरह इनकी सीटें भरी हुई है इसी से पता चलता है कि ये गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा देने के लिए प्रतिबद्ध है जिसकी वजह से छात्र इनकी तरफ आकर्षित हो रहें है  

 अधिकांश निजी संस्थान उच्च शिक्षा में छाई मंदी से इस कदर हताश और निराश हो चुके है कि अब वो कुछ नया नहीं करना चाहते न ही उनके पास छात्रों को स्किल्ड बनाने की कोई कार्य योजना है   दुसरी तरफ जो संस्थान अच्छी और गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा और स्किल ट्रेनिग देने की कोशिश कर रहें है उन्हें नियम कानून का पाठ पढ़ाया जा रहा है उन्हें तरह तरह से परेशान किया जा रहा है मतलब वो स्वतंत्र रूप से काम नहीं कर पा रहें है यूजीसी और एआईसीटीई के कई दशक पुराने क़ानून भी उन्हें ठीक से और स्वतंत्र रूप से काम करने की आजादी नहीं दे पा रहें है  कहने का मतलब यह कि जो संस्थान देश हित में ,छात्र हित में कुछ इनोवेटिव फैसले ले रहे है वो सरकारी लाल फीताशाही का शिकार हो रहे है कुल मिलाकर यह स्थिथि बदलनी चाहिए दशको पुरानें क़ानून बदलने चाहिए और हर संस्थान चाहे वो सरकारी हो या निजी हो उसे अपने स्तर पर छात्रों को स्किल ट्रेनिंग की आजादी मिलनी चाहिए इसके साथ ही देश के सभी तकनीकी और उच्च शिक्षण संस्थानों में स्किल डेवलपमेंट को शिक्षा का अनिवार्य अंग बनाने की कोशिश होनी चाहिए
अधिकांश कालेजों से निकलने वाले लाखों युवाओं के पास इंजीनियरिंग या तकनीकी डिग्री तो है लेकिन कुछ भी कर पाने का स्किल नहीं है जिसकी वजह से देश भर में  हर साल लाखों लाखों इंजीनियर बेरोजगारी का दंश झेलने को मजबूर है । हमें यह बात अच्छी तरह से समझनी होगी की स्किल इंडिया के बिना मेक इन इंडिया का सपना भी नहीं पूरा हो सकता ।इसलिए इस दिशा में अब ठोस और समयबद्ध प्रयास करनें होंगे। इतनी बड़ी युवा आबादी से अधिकतम लाभ लेने के लिए भारत को उन्हें स्किल बनाना ही होगा जिससे युवाओं को रोजगार व आमदनी के पर्याप्त अवसर मिल सकें सीधी सी बात है जब छात्र स्किल्ड होगें तो उन्हें रोजगार मिलेगा तभी उच्च और तकनीकी शिक्षा में व्याप्त मौजूदा संकट दूर हो पायेगा