Thursday, 25 August 2022

आजादी के अमृत महोत्सव पर डॉ. अशोक कुमार गदिया चेयरमैन, मेवाड़ ग्रुप ऑफ इंस्टीट्यूशंस का उद्बोधन

आज का युग धर्म 

           देश के 75वें स्वतंत्रता दिवस पर

डॉ. अशोक कुमार गदिया चेयरमैन, मेवाड़ ग्रुप ऑफ इंस्टीट्यूशंस

                    का उद्बोधन


                    प्रिय मित्रो, आज हम हमारे देश का 75वाँ स्वतंत्रता दिवस मनाने जा रहे हैं। यह हमारे लिये अति विशिष्ट आनन्द का विषय है। इस पावन अवसर पर आपको ढ़ेर सारी हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएँ।

मैं इस अवसर पर हमारे स्वतंत्रता संग्राम में शहीद हुए लाखों शहीदों को अपनी विनम्र श्रद्धांजलि देते हुए उन्हें हृदय से प्रणाम करता हूँ। हमारी स्वतंत्रता का इतिहास अदम्य साहस, बलिदानों एवं देश की आज़ादी के लिए हँसते हुए अनाम कुर्बानी देने का इतिहास है। जिसे हमें कभी नहीं भुलाना चाहिए। जब मैं इतिहास पर निगाह डालता हूँ तो पाता हूँ कि देश के कोने-कोने से हर वर्ग, हर समाज, हर जाति के लोगों ने निःस्वार्थ रूप से देश के स्वतंत्रता आंदोलन में हिस्सा लिया और अपने सुनहरे भविष्य की चिन्ता किये बगैर अपने आपको बलिदान कर दिया, बस इस अपेक्षा में कि हमारी कुर्बानी से आने वाली पीढ़ी को एक आज़ाद भारत में साँस लेने का निर्भीक और स्वछंद वातावरण मिलेगा। उनके सिर पर गुलामी का बदनुमा दाग न होगा। इस कुर्बानी के दौर में हर वर्ग की महिलाएँ भी पीछे नहीं रहीं। बल्कि उन्होंने कई मौकों पर पुरुषों से आगे बढ़कर अपना उदाहरण प्रस्तुत किया और पुरुषों को स्वतंत्रता संग्राम में जमकर संघर्ष करने का मार्ग दिखाया।

हमारे स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास को बारीकी से देखें तो पायेंगे कि इस संग्राम में दो तरह के महापुरुषांे एवं महिलाओं ने भाग लिया। एक, वे जो ज़्यादा भावुक थे और दूसरे वो जो ज़्यादा भावुक न होकर होशियार थे। जो भावुक थे उन्होंने हँसते-हँसते अपनी जान की बाज़ी लगा दी और गुमनाम हो गये। उन्होंने अपने घर परिवार की चिन्ता किये बिना अपने आपको देश की स्वतंत्रता के लिये कुर्बान कर दिया। उसके बाद उनके परिवारों की बड़ी दुर्दशा हुई, जो हम सबको ज्ञात है और यह हम सब लोगों के लिये बड़ी शर्म की बात भी है कि आज़ाद भारत के समाज एवं सरकार ने उनको न तो उचित सम्मान दिया और न ही उचित वित्तीय सहायता। स्वतंत्रता के 75वें साल जिसे अमृत महोत्सव का नाम दिया गया, उसमें हमारे आदरणीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र दामोदर दास मोदी जी ने उन्हें सम्मानपूर्वक याद करने का प्रयास किया, इसके लिए उनका धन्यवाद। दूसरे किस्म के वे लोग थे जिन्होंने आज़ादी के संग्राम मंे हिस्सा लिया, बढ़-चढ़कर बड़ी होशियारी से अपने और अपने परिवार को बचाकर उन्होंने अंहिसा एवं समझौते का रास्ता अपनाया। अंग्रेज सरकार से मिल-जुलकर उनसे स्वतंत्रता का संघर्ष शान्तिपूर्ण तरीके से करते रहे और अख़बारों की सुर्खियों में बने रहे। कई बार तो ऐसा लगता है कि वो अंग्रेजों के एजेन्डे पर ही चलकर देश को आज़ाद करवाने का प्रयास कर रहे थे। उन सभी लोगों को यह पता था कि देश आज़ाद होगा ही होगा, क्योंकि इस देश को छोड़ के जाना अंग्रेजों की भौगोलिक, राजनैतिक एवं समसामयिक आवश्यकता थी। दो विश्व युद्धों के पश्चात् वैश्विक परिदृश्य बहुत अधिक अंग्रेजी सल्तनत के पक्ष में नहीं रहा था। अंग्रेजों को अपना मुल्क बचाना मुश्किल हो रहा था। विश्वभर में उपनिवेशवाद चरमा रहा था।

हमारा इतिहास बताता है कि इसलिए ऐसे समझदार एवं होशियार किस्म के देशभक्तों के मन में सत्ता भोगने के मंसूबे हिलोरें ले रहे थे और इसके मद्देनज़र वे सब अपनी-अपनी स्थिति मजबूत करने में लग गये थे। जबकि इसमें अपवाद थे-लाला लाजपत राय, बाल गंगाधर तिलक, विपिन चन्द्र पाल, नेताजी सुभाष चन्द्र बोस, मदन मोहन मालवीय, वीर सावरकर, महात्मा गांधी एवं सभी क्रान्तिकारी नेता थे। महात्मा गांधी का नाम लेकर चलने वाले सभी नेताओं ने वह हर समझौता किया जो अंग्रेज चाहते थे, और अंग्रेज क्या चाहता था? वह यह चाहता था कि हम भारत तो अवश्य छोडे़ं लेकिन इसको इस तरह से बाँटकर कमज़ोर कर जाएँ ताकि भारतवासी आगे आने वाले 100 सालों तक ऊपर न उठ सकें। उन्होंने हमें जाति के नाम पर, वर्ग के नाम पर, क्षेत्र के नाम पर, भाषा के नाम पर, गरीबी-अमीरी के नाम पर, हर तरह से बाँटा और अन्त में भारत माता का अंग भंग कर हमारी माँ को लहूलुहान कर उसका स्वरूप बिगाड़ने की कुचेष्टा की। जिसके बच्चे अनाथ होकर भटक रहे थे, आपस में लड़कर मर रहे थे, उन हालात में हमने अपनी लहूलुहान माँ को पाकर अपनी आज़ादी का जश्न मनाया। उस जश्न में उस समय के सबसे बड़े जन नेता महात्मा गांधी ने हिस्सा नहीं लिया। क्योंकि उनकी आत्मा रो रही थी। उस वक्त के सबसे बड़े हिन्दू संगठन हिन्दू महासभा, आर्य समाज, राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने भी आज़ादी के जश्न में हिस्सा नहीं लिया था। उस समय के सभी प्रभावशाली राजा-महाराजा भी पसोपेश में थे। उन्हें यह समझ ही नहीं आ रहा था कि यह कैसी आज़ादी है! इसलिए उन्होंने भी आज़ादी के जश्न में हिस्सा नहीं लिया। मुस्लिम लीग जो इस देश के मुसलमानों की सबसे बड़ी पार्टी थी वह तो अपना अलग देश बना रही थी। इसलिए उसका इस जश्न में हिस्सा लेने का सवाल ही नहीं था। उस समय की एक और महत्वपूर्ण घटना हुई, वह यह थी कि अंग्रेजों के निर्देश पर हमारी संविधान सभा बनी। संविधान सभा के लिये पूरे देश के कांग्रेसी एवं सामाजिक नेता चुने गये। उनमें कोई राजा-महाराजा या उनका प्रतिनिधि नहीं था। उनमें कोई क्रान्तिकारी आन्दोलन से सम्बन्ध रखने वाला भी नहीं था। मुस्लिम लीग ने तो इस संविधान सभा का बहिष्कार ही किया था। यह संविधान एक मायने में गांधीवादी कांग्रेसियांे एवं कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं का ही एक झुण्ड था, जो अंग्रेजों के निर्देश पर कार्य कर रहा था और उनकी इच्छा एवं आकांक्षा के अनुरूप हमारा संविधान बना रहा था। उसमें भी महत्वपूर्ण बात यह थी कि संविधान सभा के सभी सदस्य संविधान के प्रारूप पर बिल्कुल भी सहमत नहीं थे, फिर भी हमारा संविधान का प्रारूप सर्वसम्मति से पास हो गया। इस संविधान में भारत की सामाजिक, सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक शक्ति पर गहरी चोट की गई है। यदि यह कहा जाए कि अंग्रेजों द्वारा बनाये गये संविधान में भारत की आत्मा का गला घोटा गया तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। फिर भी भारत एक महान देश है यहाँ के लोग विश्व में सबसे ज्यादा सहिष्णु हैं, हम सबने अपने स्वतंत्रता दिवस को हर्ष के साथ मनाया और प्रतिवर्ष इसको अधिक से अधिक उत्साह, उमंग एवं खुशी से मना रहे हैं और आगे भी मनाते रहेंगे। इस दिन हम उन सभी स्वतंत्रता सेनानियों का जो हमारे देश के लिये शहीद हुए या जो शहीद तो नहीं हुए पर उन्होंने संघर्ष कर इस देश के क्षत-विक्षत हालात संभाले और आज इस विकास के नये मुकाम पर लाये, उन सबको श्रद्धापूर्वक प्रणाम करते हैं। हम आज़ादी के बाद उन सैनिकों एवं सुरक्षाकर्मियों को भी प्रणाम करते हैं जिन्होंने हमारे देश को बाहरी एवं आंतरिक हमलों से बचाया। हम उन शहीदों को विशेष सम्मान देते हैं जिन्होंने हमें सुरक्षित रखने के लिये अपने आपको शहीद कर दिया। हम इस अवसर पर उन नेताओं, अधिकारियों, न्यायाधीशों, तमाम पेशेवरों, वैज्ञानिकों, अध्यापकों, समाजसेवियांे को भी प्रणाम करते हैं जिन्होंने ईमानदारी से पूरी प्रमाणिकता के साथ देश की सेवा की और इसे आगे बढ़ाया।

अगर हम अपने इतिहास पर फिर नज़र डालें तो पाएंगे कि अंग्रेजों ने बड़ी ही कुटिलता एवं धूर्ततापूर्वक हमारे देश के दो टुकड़े करने का प्रयास सन् 1909 से ही प्रारम्भ कर दिया था। उन्होंने पृथक मुस्लिम मत का फैसला कर देश में फिरकापरस्ती का बीज बो दिया, जो अन्ततोगत्वा देश के विभाजन के रूप में सामने आया और जब विभाजन हुआ तो ऐसा हुआ कि उस वीभत्स घटनाक्रम को विश्व इतिहास भुला नहीं सकता। विश्व के कुछ नरसंहारांे में से यह एक भयंकर नरसंहार था। लगभग 5 लाख निर्दोष लोग बेहरमी से मारे गये। हजारों महिलाओं के साथ दुष्कर्म हुए। अपार सम्पत्ति लूटी गई। लाखों लोग बेघर हुए। भारत को सांप्रदायिकता, विद्वेष एवं नफरत की आग में धकेल दिया गया। सदियों से चली आ रही साझी संस्कृति एवं भाईचारा तार-तार हो गया। आपसी विश्वास का संकट पैदा हो गया। भारत के दोनों हिस्से हिन्दुस्तान एवं पाकिस्तान घोर आर्थिक एवं सामाजिक संकट की चपेट में आ गये।

मित्रों हमारा देश सन् 1947 के क्षत-विक्षत हालात से आगे बढ़ना शुरू हुआ। हमने अंग्रेजों द्वारा हम पर थोपा हुआ संविधान अंगीकार किया और यह माना कि इसी संविधान की सर्वोच्चता को स्थापित रख हम सभी चुनौतियों का मुकाबला करते हुए आगे बढ़ेंगे। जब आगे बढ़ने की बात आई तो हमारे सामने दो विकल्प थे-आर्थिक एवं सामाजिक विकास की पहल। हम गांधीवादी मॉडल जो कि विशुद्ध भारतीय मॉडल था। जिसमें हम अपने गाँवों का सर्वांगीण विकास कर गांवों को आत्मनिर्भर बनाते हुए शहरी विकास की ओर बढ़े, जिसमें कृषि, कुटीर उद्योग, सादगी, मितव्ययिता, सीमित आवश्यकतानुसार उपभोग, मातृभाषा में शिक्षा, अध्यात्म एवं नैतिकता पर ज़ोर था। शासन विकेन्द्रित था। ग्राम पंचायत और ग्रामसभा की सर्वोच्चता पर आधारित था। दूसरा मॉडल था अधिकतम उपभोग की पाश्चात्य अवधारणा पर काम करना। जिसमें अधिक से अधिक उत्पादन एवं अधिक से अधिक उपभोग पर ज़ोर था। जिसमें बड़े कल कारखाने लगाना, बड़े शहर को बसाना था, अधिक से अधिक कृत्रिम ऊर्जा का उपयोग था और प्राकृतिक संसाधनों का निर्मम दोहन था। हमारे प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने दूसरा विकल्प अपनाया। देश के आर्थिक विकास की बात करने से पूर्व दो मुख्य मुद्दोें पर चर्चा करना आवश्यक होगा। पहला, अंग्रेज सरकार ने बड़ी कुटिलता से देश को तोड़ने- फोड़ने एवं विघटित करने के उद्देश्य से एक घोषणा की। जिसके तहत सभी  देशी रियासतों को यह छूट दी कि वे चाहें तो भारत में रहें, वे चाहें तो पाकिस्तान में रहंे और वे चाहें तो अपना स्वतंत्रता का स्थायित्व कायम रखते हुए अपना अलग देश बना लें।

यह बड़ी विषम चुनौती थी, जिसे हमारे तत्कालीन गृहमंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल ने बड़ी सूझ-बूझ, समझदारी एवं दृढ़ इच्छाशक्ति का परिचय देते हुए सभी देशी रियासतों को भारत में मिलाया। जिसमें जूनागढ़, हैदराबाद एवं जम्मू-कश्मीर की चुनौतियाँ तो बड़ी पेचीदा एवं कठिन थी, जिसका उन्होंने बड़ी कुशलता से पूरी ताकत लगाकर समाधान निकाला। जम्मू-कश्मीर की विशेष भौगोलिक एवं सामाजिक परिस्थितियाँ सबसे भिन्न थीं। मगर नेहरूजी एवं सरदार पटेल ने मिलकर उसका भी हल भारत के हित में निकाला, परन्तु इसमें कुछ कमी रह गयी, जिसे हम आज तक भुगत रहे हैं। जम्मू-कश्मीर में उस वक्त थोड़ा और ताकत का इस्तेमाल करना था। यूरोपीय देशों एवं अमेरिका के दबाव में न आकर हमारी सेना का पूर्ण उपयोग करते हुए इस पूरे प्रदेश को अपने नियंत्रण में लेना था, पर शीर्ष नेताओं की आपसी समझ एवं समन्वय की कमी से हम ऐसा नहीं कर पाये, जिसकी कीमत हम आज भी चुका रहे हैं।

इसी बीच हमने चार युद्ध लड़े- 1962, 1965, 1971 एवं 1999

उनका संक्षिप्त विवरण इस प्रकार है -

(1)   1962 का युद्ध चीन से हुआ, जो हमने अपनी राजनीतिक कमजोरी की वजह से हारा और तिब्बत प्रदेश जो एक तटस्थ देश था, उसको चीन को कब्जा करने दिया। तिब्बत से लगा भारत का बड़ा महत्वपूर्ण हिस्सा जिसे सियाचीन कहते हैं, वह हमने खो दिया।

(2)   1965 का युद्ध पाकिस्तान से हुआ जब हमारे प्रधानमंत्री थे लाल बहादुर शास्त्री जी, उनके नेतृत्व में देश में जय जवान एवं जय किसान का नारा गूंजा। हमारी सेना बहुत ही बहादुरी से लड़ी और हमने विजय प्राप्त की। उससे हमारी सेना एवं जनता का मनोबल ऊँचा उठा।

(3)   1971 का युद्ध पुनः पाकिस्तान से हुआ, उस वक्त हमारी प्रधानमंत्री श्रीमती इंन्दिरा गांधी थीं। हमारी सेना एवं राजनैतिक नेतृत्व ने बड़ी बहादुरी दिखाई। विश्वभर के मुल्कों की धमकियों को दरकिनार करते हुए पाकिस्तान के दो टुकड़े कर दिये और बांग्लादेश नाम का नया देश बना दिया।

(4) वर्ष 1999 में हमने एक छोटा युद्ध पाकिस्तान से फिर लड़ा, उस वक्त हमारे प्रधानमंत्री थे अटल बिहारी वाजपेयी। हमारे जवान बड़ी मुस्तैदी से लड़ाई लड़े। पाकिस्तान को द्रास एवं कारगिल की पहाड़ियों से धकेल दिया और भारत की सीमा को अक्षुण्ण रखा ।

उस वक्त हमारे पास मौका था। वक्त का तकाजा भी था कि हमें पाक अधिकृत कश्मीर अपने कब्जे में करना था, पर हमसे चूक हुई। हमने ऐसा क्यों नहीं किया, इसके बड़े राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय राजनैतिक कारण हैं, मजबूरियाँ हैं, जोकि एक शोध का विषय है।

इन विषम परिस्थितियों में सन् 1947 से हिन्दुस्तान की सरकार पण्डित जवाहर लाल नेहरू के नेतृत्व में काम करने लगी। देश के आर्थिक एवं सामाजिक विकास के लिये योजना आयोग बनाया गया। जिसके माध्यम से योजनाबद्ध विकास का सिलसिला प्रारम्भ हुआ।

प्रत्येक योजना घाटे की योजना होती थी। सरकार हर वर्ष घाटे का बजट बनाती थी और घाटे को पूरा करने के लिए विदेशी ऋण लेती थी और अपने रुपये का अवमूल्यन करती थी। अधिक से अधिक रुपया छापकर मुद्रा स्फीति बढ़ाती थी। उसका परिणाम यह होता था कि बेतहाशा महंगाई बढ़ती थी। विकास का ऐसा मॉडल बनाया गया कि अधिक से अधिक उत्पादन एवं उपभोग बढ़ाया जाए। सरकार एक वेलफेयर स्टेट के रूप में काम करे और हर वर्ष अपना घाटा बढ़ाती जाए और विदेशी ऋण बढ़ता जाए। सन् 1990 तक आते-आते हालात ये हो गये कि हमें अपना सोना गिरवी रखना पड़ा। तब देश के प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव बने। उन्होंने प्रमुख अर्थशास्त्री मनमोहन सिंह को वित्तमंत्री बनाया। जिन्होंने भारतीय अर्थव्यवस्था को विश्व बाजार के लिये खोल दिया। फिर क्या था पूरे विश्व के पैसे वाली कम्पनियों ने भारत में आकर अपना आधिपत्य जमाना शुरू किया। देखते ही देखते पूरा देश आर्थिक रूप से गुलाम हो गया। हमारी आर्थिक स्वायत्तता जाती रही। अब हमारी आर्थिक नीतियां विश्व बैंक, अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष एवं बड़ी अमेरिकी, यूरोपीय, जापानी, कोरियन एवं चाइनीज कम्पनियों के दिशा निर्देश पर बनती हैं और हमारा व्यापार विश्व व्यापार संगठन के नियम कायदों से चलता है। हम चाहकर भी कुछ विशेष नहीं कर सकते। देश में खुलकर हर वस्तु का सट्टा होने लगा, जिससे हर वस्तु के दाम आसमान छूने लगे। देश के एक विशेष वर्ग ने उसी समय स्वदेशी की अलख जगाई। पूरे देश में जनजागरण किया, आन्दोलन किया और फिर भारत को गांधीजी के रास्ते पर लाने का प्रयास किया। हिन्द स्वराज की बातंे होने लगीं पर जब जनता ने उनको सत्ता में आने का मौका दिया तो उन्होंने स्वदेशी की बात छोड़कर भारत के विश्वस्तरीय विकास एवं चकाचौंध के सपने दिखाने शुरू किये। मेड इन इंडिया की जगह मेक इन इंडिया का नारा बुलन्द होने लगा। इसका नतीजा यह हुआ कि बड़ी-बड़ी विदेशी कम्पनियों ने अपने एसेम्बली प्लान्ट यहाँ खोल दिये। सारा सामान बाहर से यहाँ आकर असेम्बल होने लगा और मोहर लगी मेक इन इंडिया। दूसरा नारा लगा स्किल इंडिया का, छैक्ब्ए  क्क्ज्ञटल् आदि ने करोड़ों रुपये खर्च किये। करोड़ों नौजवान प्रशिक्षित भी हुए, पर बेरोज़गारी खत्म नहीं हो पाई। तीसरा नारा लगा स्टार्टअप का, जिसमें जमकर विदेशी पैसा लगा और इसका सारा लाभ विदेशी कम्पनियाँ ले रही हैं। सांप्रदायिक वैमनस्य एवं आध्यात्मिक उन्माद बढ़ने लगा। अमीरों एवं गरीबों की बीच की खाई और बढ़ने लगी। मध्यम वर्ग एवं छोटा व्यापारी हर समय अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ने लगा और हर समय पिछड़ता ही गया। उनके बच्चों ने तय किया कि इन परिस्थितियों में हम व्यापार नहीं कर सकते, हमारे लिए विदेशी एवं देशी कम्पनियों में नौकरी करना ही श्रेयस्कर होगा। पूरे देश में छोटे व्यापारी एवं पेशेवर खत्म हो रहे हैं। उनके स्थान पर बड़ी विदेशी कम्पनियाँ अपना प्रभुत्व जमा रही हैं। देश देशी एवं विदेशी कर्ज़ में डूबा हुआ है। वर्तमान में भारत सरकार पर 1,35,000 लाख करोड़ का कर्ज़ है, जो सन् 2024 तक 1,50,000 लााख करोड़ तक पहुंचने का अनुमान है। प्रत्येक राज्य औसतन 3 से 4 लाख करोड़ के कर्ज़ में डूबा हुआ है। सरकार इस दबाव से निकलने के लिये अपनी सभी सम्पत्तियों को बेचने के लिये मजबूर है। साथ ही साथ सत्ता में रहने के लिए हर तरह की लोक लुभावन योजनाएं बनाकर जनता के एक विशेष वर्ग को सब कुछ मुफ्त देने पर उतारू है। एक से बढ़कर एक योजना बनाकर उसे लागू कर चुनाव मैदान में उतर रही है। उसका सीधा भार करदाताओं पर लाद दिया जा रहा है। भारत के करदाता अपनी आमदनी का 20 से 60 प्रतिशत से भी अधिक कर के रूप में भुगतान करते हैं, बदले में कोई सरकारी सुविधा प्राप्त नहीं कर पाते। उल्टा चोर कहलाते हैं। करदाता हर समय पुलिस एवं प्रशासनिक विभागों से आतंकित रहता है। अकूत भ्रष्टाचार है। प्रशासनिक तानाशाही है। धींगामुश्ती है। खुली लूट-खसोट है। बेरोज़गारी है। इसके बावजूद भारत एक महान देश है, इसकी महान संस्कृति है, महान परम्परा है, यहां के लोग हर परिस्थिति में आगे बढ़ने का जज्बा रखते हैं। आज हमारे युवाओं ने अपनी लगन एवं परिश्रम के बलबूते पूरे विश्व में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा रखा है। हम हर क्षेत्र में आगे बढ़ रहे हैं। चाहे वह शिक्षा हो, स्वास्थ्य हो, आधारभूत विकास हो, सूचना प्रौद्योगिकी एवं तकनीकी विकास हो, पर्यटन हो, फैशन हो, उद्योग हो, कृषि हो, यातायात हो। आज भौतिक विकास में हम तीव्र गति से आगे बढ़ रहे हैं। दिन-प्रतिदिन नये कीर्तिमान स्थापित कर रहे हैं पर उतनी ही तीव्रगति से हम अपना नैतिक पतन भी कर रहे हैं। आज हमारा सामाजिक ताना-बाना, हमारी संस्कृति-सभ्यता, हमारे महापुरुष, हमारे उच्च आदर्श, हमारी शुचिता, हमारा पर्यावरण, हमारी कृषि, हमारे छोटे उद्योग-धन्ध,े हमारी उत्पादन क्षमता, हमारी स्कूली शिक्षा एवं उच्च शिक्षा, राजनीति से प्रभावित है तथा पूर्णतया सरकार पर अवलम्बित हो गयी है।

इससे हमारे मौलिक एवं स्वाभाविक विकास पर विपरीत प्रभाव पड़ा है। परन्तु हम सब लोगों को यह ध्यान रखना चाहिए कि यह देश हमारा है, इसको महान बनाना हमारा परम कर्तव्य है। इस देश को सशक्त एवं महान बनाने में कोई बाहर से नहीं आयेगा। यह महत्वपूर्ण कार्य तो हमें ही करना होगा। वह कैसे होगा और कैसा होगा और कब होगा आइये हम इसको जानते हैं ?

आज का युग धर्म

 

डॉ0 अशोक कुमार गदिया

महत्व की बात यह है कि हमारे समाज में आज आने वाली पीढ़ी को कैसे मार्गदर्शन की आवश्यकता है? यह इस बात पर निर्भर करता है कि हम कैसा समाज एवं राष्ट्र चाहते हैं? उनमें ऐसी कौन-सी विशेषताएँ होनी चाहिएं जिससे हम विश्व पटल पर सभ्य समाज एवं सुदृढ़ राष्ट्र के रूप में जाने जा सकें। जब यह बात ध्यान आती है तो स्वाभाविक रूप से निम्न बिन्दु सामने आते हैं-

1)    व्यक्ति मानव मूल्यों का पालक एवं पोषक हो।

2)    व्यक्ति सामाजिक विषयांे पर संवेदनशील हो तथा सामाजिक असमानता, सार्वजनिक दोषों एवं कुरीतियांे को दूर करने के लिये प्रतिबद्ध हो।

3)    व्यक्ति राष्ट्रभक्त हो, अपनी संस्कृति, सभ्यता, महापुरुषांे एवं जीवन मूल्यों पर गर्व करता हो। हर परिस्थिति मंे उसकी पालना करता हो।

4)    व्यक्ति व्यक्तिगत रूप से पढ़ा-लिखा, होशियार, सजग, स्वस्थ, मजबूत, आत्मविश्वासी एवं आत्मनिर्भर हो।

5)    व्यक्ति या तो अच्छी नौकरी करता हो या अच्छा व्यवसाय या व्यापार करने में सक्षम हो एवं अपनी विद्या में निपुण हो।

6)    हमारी शिक्षा बहुआयामी हो, जो शिक्षा के बाद रोजगार, व्यापार एवं व्यवसाय के साथ जुड़ना चाहते हैं, उन्हें वैसा मौका मिले जो साहित्य, कला, संस्कृति, विज्ञान, खेल-कूद, योग, व्यायाम, अध्यात्म, राजनीति आदि में जाना चाहें, उनको  वैसा अवसर प्राप्त हो। जो अनुसंधान एवं उच्च शिक्षा की ओर जाना चाहें, उनको वह अवसर उपलब्ध हो। रोजगारपरक शिक्षा सबके लिए हो। यानी तकनीकी एवं व्यवसायिक शिक्षा सबके लिए उपलब्ध हो। कला, संस्कृति, संगीत, इतिहास, राजनीति विज्ञान, मेडिकल, खेल-कूद, पर्यावरण आदि विशिष्ट प्रतिभा वाले लोगों के लिये हों।

7)    सामाजिक व्यवस्था जैसे न्याय, सुरक्षा, व्यापार, व्यवसाय एवं रोजगार के समान अवसर, स्वच्छता, पर्यावरण एवं शुद्धता सुनिश्चित हो।

8)    हम सब हृदय से सह-अस्तित्व के सिद्धान्त को स्वीकार करें। उसको ईमानदारी से व्यवहार में  लाएं।

9)    भारत सरकार एवं सभी राज्य सरकारें विदेशी कर्ज़ से मुक्त हों। ऐसा संकल्प हर भारतीय का हो।

10)   सरकार का प्रथम दायित्व हो, आम जनता को न्याय एवं सुरक्षा निश्चित करना एवं द्वितीय दायित्व हो लोक कल्याण।

 

      यदि हम उपरोक्त विषयांे को ध्यान में रखकर आगे आने वाली पीढ़ी का मार्गदर्शन करेंगे तो हम वैसा ही समाज एवं राष्ट्र बनायेंगे, जैसा हम चाहते हैं। आज हम भारत देश पर निगाह डालें तो पायेंगे कि यह एक विशाल देश है, जहाँ 130 करोड़ लोग रहते हैं। इन 130 करोड़ लोगों में तकरीबन 70 करोड़ युवा हैं। यह शायद विश्व की सबसे अधिक युवा आबादी का देश है। इस मायने में हमारा देश एक युवा देश है। हालांकि हमारी संस्कृति, सभ्यता एवं अस्तित्व विश्व में सबसे पुराना है। एक युवा देश होने के नाते हमारे देश में कुछ स्वाभाविक लक्षण होने चाहिएं-जैसे अत्यधिक शक्ति, जोश, स्फूर्ति एवं हर समय कुछ नया एवं विशिष्ट करने का जज्बा, नयी उमंग, खेलकूद, साहसिक कार्य, अध्ययन एवं अनुसंधान, व्यवसाय, रोजगार, कला-संस्कृति, देशभक्ति, समाजसेवा, नई तकनीक, फैशन, साज-सज्जा आदि। क्योंकि जहाँ युवा पीढ़ी होगी, वहाँ ये कार्य स्वाभाविक रूप से नित नूतन तरीकों से बढ़िया होंगे। होने भी चाहिएं। परन्तु जब वास्तविकता पर दृष्टिपात करेंगे तो पायेंगे कि हमारे यहाँ इन सबमें जिस अनुपात मंे प्रगति होनी चाहिए, उतनी नहीं हुई है। इन सब कार्यों में विश्वस्तरीय हमारी पूर्ण निपुणता, गुणवत्ता एवं संख्या बहुत कम है। हमारी युवा जनसंख्या के अनुपात में तो यह बिल्कुल नगण्य है।

इस पिछड़ेपन का मूल कारण क्या है? बहुत सोचने पर जो मुझे समझ आता है, वह यह कि हमारे नौजवानों को घर से लेकर विद्यालय, महाविद्यालय एवं विश्वविद्यालय तक में न तो उचित शिक्षा मिली, न उचित प्रशिक्षण मिला और न ही उचित सलाह एवं प्रोत्साहन मिला।

कहने का मतलब यह कि युवाओं का स्वाभाविक विकास नहीं हुआ। उनका विकास व्याप्त रीति-रिवाजों, परिस्थितियों, देखा-देखी, दुष्प्रचार, गलतफहमी, गलत सरकारी नीतियों, राजनैतिक दलों की साजिशों और असामाजिक तत्वों के प्रलोभन से हुआ। उसका नतीजा है हर तरफ अफरा-तफरी, आतंक, हिंसा, असंतोष, भ्रष्टाचार, शोषण, जातिवाद, बेरोजगारी, सरकारी नौकरी का लालच, सरकार पर पूर्ण निर्भरता, कामचोरी, हरामखोरी, अनुशासनहीनता, चोरी, डकैती, लूट, झूठ, हेराफेरी, मिलावट, कम तौल, हत्या, बलात्कार, आत्महत्या, बेवजह तनाव, नशाखोरी, सामाजिक असमानता आदि से हम ग्रसित हैं। हमारी युवा पीढ़ी और इसमें यह मानसिकता दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है।

किसी भी राष्ट्र एवं समाज को यदि उन्नति के शिखर पर पहुँचना है, खुशहाल होना है तो उस देश का युवा जब तक आत्मविश्वास से भरपूर, आत्मनिर्भर, अपने अधिकारों एवं दायित्वों के प्रतिपूर्ण रूप से सजग, सामाजिक रूप से संवेदनशील, राष्ट्रीय रूप से देशभक्त, अपनी संस्कृति, सभ्यता एवं महापुरुषों का आदर करने वाला, मानसिक एवं शारीरिक रूप से पूर्णतया विकसित और सुदृढ़ नहीं होगा, तब तक देश उन्नति के शिखर पर नहीं पहुँच सकता। वहाँ का समाज प्रगतिशील एवं सभ्य नहीं हो सकता।

अतः इस कालखण्ड में सबसे महत्वपूर्ण राष्ट्रीय एवं सामाजिक कार्य यदि कोई है तो वह है युवा पीढ़ी के बीच काम करना, उसको अच्छे से पढ़ाना-लिखाना, प्रशिक्षण देना, सामाजिक एवं राष्ट्रीय विषयों की पूर्ण प्रमाणिक जानकारी देना और उनमें सामाजिक व राष्ट्रीय चेतना जागृत करना। उनको इस देश की कला-संस्कृति, संस्कार एवं महापुरुषों के साथ जोड़ना और उनके प्रति गौरव का भाव पैदा करना। उनमें हर परिस्थिति में देश एवं समाज के हित में कुछ करते रहने का जज्बा पैदा करना।

समाज के पिछड़े एवं दबे हुए उपेक्षित तबके के प्रति दया या घृणा का भाव नहीं, अपनेपन का भाव जगाना और लगातार उनके विकास के लिये कुछ करते रहने का भाव पैदा करना। नौजवानों की अच्छी नौकरी लगवाना। जो अच्छी नौकरी नहीं कर सकते, उन्हें अच्छे उद्यमी बनने के लिए प्रेरित करना, हर नवयुवक को अपने व्यक्तित्व को निखारने का सुअवसर प्रदान करना, उसको एक जिम्मेदार नागरिक बनाना और अंततः उसको अपनी विद्या में एक कामयाब पेशेवर बनाकर सामाजिक जीवन में भेजना। यह है आज के समय का युग धर्म।

अब यह सवाल उठता है कि यह सब काम कहाँ होंगे, कब होंगे, कैसे होंगे? और उन्हें कौन करेगा? इन सब प्रश्नों के उत्तर देने से पहले मैं एक बात और स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि नौजवान तैयार करने की प्रक्रिया लगातार चलने वाली प्रक्रिया है। यह कोई एक दिन, एक सप्ताह या एक माह के प्रशिक्षण शिविर से पूरी नहीं होने वाली है। इस काम को सरकार तो बिल्कुल भी नहीं कर सकती है।

नौजवान तैयार करने का काम विद्यालयों, महाविद्यालयांे एवं विश्वविद्यालयों में दिन-प्रतिदिन होगा। इसको करेंगे प्रतिदिन पढ़ाने वाले अध्यापक, प्राध्यापक एवं प्रबन्धन के वरिष्ठजन और यह होगा एक विशिष्ट शैक्षणिक पद्धति का गठन कर उसको उपयोग में लाने से, वह विशिष्ट पद्धति है जिसमें अध्यापक का कार्य हो।

1.    पढ़ना, पढ़ाना एवं सिखाना

2.    व्यावहारिक प्रशिक्षण देना

3.    रोजगार दिलाना

4.    मित्र या मार्गदर्शक बनना

विद्यार्थियों के लिये एक मित्र, मार्गदर्शक एवं अच्छे गुरु का काम करना। ये सभी कार्य अध्यापक की सेवाकार्य का अनिवार्य हिस्सा हो, उसे इस काम को करना ही करना है और दिन-प्रतिदिन करना है। । जमंबीमत ींे जव इम ं उमदजवत वत बवनदेमसवत ंदक बवनदेमसपदह उनेज इम ंद पदजमहतंस चंतज व िीपेध्ीमत कनजलण् इसके साथ ही शैक्षणिक दिनचर्या ऐसी होनी चाहिये कि पढ़ने, पढ़ाने एवं काउंसिलिंग के अतिरिक्त ऐसी गतिविधियाँ, साँस्कृतिक कार्यक्रम लगातार करते जाना, जिससे विद्यार्थी एवं अध्यापकों का सर्वांगीण शारीरिक, मानसिक, सामाजिक, साँस्कृतिक एवं संवेगात्मक बौद्धिक विकास हो, जिससे उनमें राष्ट्रभक्ति, समाज के प्रति संवेदनशीलता, राष्ट्र निर्माण एवं सामाजिक बुराइयों को खत्म करने का भाव हर समय जागृत हो। इस कार्य को करने के लिये हम निम्नलिखित कार्यक्रम कर सकते हैं-

1.    समय-समय पर विभिन्न महापुरुषों की जयन्तियाँ बहुत ही प्रभावशाली तरीके से मनाना। ताकि उस कार्यक्रम में सम्मिलित लोग पूर्णरूप से प्रभावित हों और उनमें ऐसा भाव पैदा हो, जिससे लगे कि हमारी रगों में उन महापुरुषों का रक्त प्रवाहित हो रहा है एवं हम इनकी संतान हैं। हमें वे सभी काम करने चाहिए जो इन महापुरुषों ने अपने समय और परिस्थितियों को देखते हुए किये।

2.    समसामायिक विषयांे पर संगोष्ठी एवं सेमिनार आयोजित किए जाएं।

3.    सामाजिक एवं संवेदनशील विषयांे पर नाटकों के मंचन किए जाएँ।

4.    सामाजिक विषयों पर परिचर्चा विषय के विशेषज्ञ को बुलाकर की जाए।

5.    प्रेरणादायक, करूणापूर्ण, शिक्षाप्रद चलचित्र दिखाकर संस्कार दिये जाएं।

6.    समाजसेवा के लिये नवयुवकों को समाज में ले जाकर सामाजिक कार्य कराए जाएं।

7.    विभिन्न बीमारियों के निवारण, उपचार एवं रोकथाम के लिये स्वास्थ्य शिविर लगाए जाएं।

8.    सामाजिक, पारिवारिक, राष्ट्रीय एवं व्यवसायिक सोच रखने वाले पेशेवर व्यक्तित्व को बुलाकर व्याख्यान एवं प्रशिक्षण शिविर लगवाए जाएं।

9.    साँस्कृतिक कार्यक्रम जैसे गीत, संगीत, नाटक, समूह एवं एकल नृत्य, रंगोली, पोस्टर, वाद-विवाद, निबन्ध, समूह परिचर्चा, भूमिका निर्वाह आदि कार्यक्रम लगातार करवाए जाएं।

10.   खेलकूद, व्यायाम, भागदौड़, योग एवं ध्यान आदि कार्यक्रम आयोजित किए जाएं।

11.   एनसीसी. एनएसएस या स्काउट/गाइड संस्था को आमंत्रित कर उनके कार्यक्रम करवाए जाएं।

इन सब कार्यक्रमों में युवा अपनी रुचि के अनुसार प्रतिभागी बनें। यह सुनिश्चित करें कि हर युवा एक या दो गतिविधियों में ज़रूर प्रतिभागी बनें, जिससे उसका सर्वांगीण विकास सुनिश्चिित होगा। प्राथमिकता के स्तर पर हमें कौन से युवाओं को पढ़ाना चाहिये? किस पर सबसे पहले काम शुरू होना चाहिए? तो वह है गाँवों से ताल्लुक रखने वाले गरीब एवं उपेक्षित वर्ग के नौजवान एवं सुदूर इलाकों में रहने वाले युवा।

कहने का मतलब है ऐसे युवाओं को प्राथमिकता से शिक्षित एवं प्रशिक्षित करना जिन तक कोई नहीं पहुँचता हो। श्त्मंबीपदह जव नदतमंबीमकश् ंदक ैमतअपदह च्ववतमेज व िजीम च्ववत ैमबजपवद व िैवबपमजलश् यह होना चाहिए मूलमंत्र। यदि हम पूरी ईमानदारी एवं पूरी प्रमाणिकता से इस मिशन पर काम करेंगे तो समाज एवं राष्ट्र को ज़िम्मेदार नागरिक के रूप में युवा देंगे।

वे ऐसे युवा होंगे जो आत्मविश्वास, आत्मनिर्भरता, निपुणता, अनुशासन, ज़िम्मेदारी, सामाजिक संवेदनशीलता, राष्ट्रभक्ति के भाव से भरे होंगे। जहाँ जायेंगे, सफल होंगे और अपनी छाप छोड़ेंगे। उससे बनेगा एक संवेदनशील एवं संस्कारी घर, परिवार एवं समाज और उससे बनेगा सुदृढ़ राष्ट्र। पर इस महान कार्य को करने के लिये हमें बनाने होंगे अच्छे अध्यापक। इसके लिये उनका ठीक से चयन करना होगा। उन्हें ठीक से प्रशिक्षित करना होगा। उन्हें ठीक से प्रोत्साहित करना होगा। जब तक अच्छा अध्यापक नहीं होगा, बच्चा अच्छा नहीं हो सकता, यह जान लीजिये। अच्छा अध्यापक होगा, प्रोत्साहन, प्रशिक्षण एवं उचित मानदेय से। तो आइये समाज एवं राष्ट्र निर्माण में अपना सहयोग दीजिए और लग जाइये अच्छा युवा एवं अच्छा अध्यापक बनाने में।

‘नहीं है अब समय कोई गहन निद्रा में सोने का,

समय है एक होने का, न मतभेदों में खोने का।

समुन्नत एक हो भारत, यही उद्देश्य है अपना,

स्वयं अब जागकर हमको जगाना देश है अपना।।’

                     ।। जयहिन्द, जय भारत।।


Monday, 6 June 2022

गरीबों और पिछड़ों को उच्च शिक्षा मुहैया कराना उद्देश्य है मेवाड़ यूनिवर्सिटी का

 बाबा भीम पब्लिक स्कूल ,स्वांग, बोकारो में , शिक्षा के क्षेत्र में काम करने वाली संस्था एडुकेयर ,धनबाद ने मेवाड़ यूनिवर्सिटी पर एक सेमिनार का सफल आयोजन किया ...इस महत्वपूर्ण सेमिनार में मेवाड़ यूनिवर्सिटी के चेयरमैन डॉ अशोक गदिया के विचारों को प्रसारित किया गया जिसमें गरीब और पिछड़ों को उच्च शिक्षा मुहैया कराना ही मेवाड़ यूनिवर्सिटी का उद्देश्य बताया गया . 

समाज के गरीब से गरीब व्यक्ति को ,वंचितों को उच्च शिक्षा दिलाने के लिए मेवाड़ यूनिवर्सिटी 2009 से शिक्षा के क्षेत्र में अग्रणी भूमिका निभा रही है ..

इस सेमिनार में प्रतिभागियों को मेवाड़ यूनिवर्सिटी में चल रहे विभिन्न कोर्सेस के बारे में जानकारी दी गई साथ ही मेधावी छात्रों के लिए छात्रवृत्ति देने की योजना को भी बताया गया।

कार्यक्रम में बाबा भीम पब्लिक स्कूल के प्रिंसिपल शिशिर कुमार उपस्थित थे ,इस कार्यक्रम में  80 बच्चों के साथ क्षेत्र बीके सरपंच,मुखिया ,वार्ड मेंबर और छात्रों के माता पिता भी सम्मिलित थे, इस कार्यक्रम का आयोजन डॉ साई प्रशंथि और डॉ प्रशांत कुमार की तरफ से किया गया है , कार्यक्रम के सफल आयोजन के लिए दोनों ने उपस्थित हुए लोगों का आभार प्रकट किया है

Friday, 14 May 2021

आपदा, संकट एवं अभाव के समय में हमारा राष्ट्रीय चरित्र ?

 डॉ अशोक कुमार गदिया

(कुलाधिपति)

मेवाड़ विश्वविद्यालय

हमारे देश में जब भी कोई संकट की घड़ी आती है तो हमारा समाज एवं सरकार किस तरह का व्यवहार करती हैं उससे हमारे देश का राष्ट्रीय चरित्र आंका जाता है। अभी हम देख रहे है कि कोरोना का संकट छाया हुआ है देश में भंयकर मारा मारी हो रही है, दवाईयों की दुकानों से आवश्यक दवाईयाँ गायब हो गयी हैं और हर जीवन रक्षक दवा अपने निर्धारित दामों से चार गुना, पाँच गुना और कोई-कोई दवा तो दस गुना और उससे भी ज्यादा दामों पर मिल रही हैं। वह भी बहुत तलाश और मिन्नतों के बाद। ऐसा क्यों हो रहा है, क्योंकि लोग इस मुश्किल वक्त में भी कालाबाज़ारी एवं मुनाफा खोरी से बाज नहीं आ रहे हैं। मैं पिछले 50 सालों से देख रहा हूँ कि जब भी हमारे देश में किसी वस्तु की कमी हो जाये तो वह वस्तु जरूरतमंद को कभी नहीं मिलेगी और मिलेगी भी तो उसकी बेहताशा कीमत चुकानी पड़ेगी। इन सबके चलते गरीब एवं मध्यम वर्ग तो बस पिस जाता है या भगवान भरोसे हो जाता है। वस्तु चाहे खाने-पीने की हो, दवा हो, आक्सीजन एवं अन्य स्वास्थ्य सम्बन्धित सेवाऐं हो, रसोई गैस हो, केरोसीन हो, डीजल व पेट्रोल हो जब भी कमी हो जाये मारामारी, कालाबाजारी एवं मुनाफा खोरी ऐसे ही होती है। फिर इस अभावग्रस्त स्थिति को सुधारने के नाम पर सरकारी अमला बीच में कूदता है और वह ऐसी स्थिति पैदा कर देता है कि मत पूछो, वह और अराजकता, लूटमार एवं भ्रष्टाचार का वातावरण तैयार कर देता है। जिसमें पनपता है भाई-भतीजावाद, व्यामिचार, दुराचार एवं पक्षपात इससे पता चलता है कि हमारा समाज विषम परिस्थितियों में कितना सभ्य है। अब आते हैं सरकारों पर, हमारे देश में जब भी संकट की घड़ी आती है चाहे महामारी हो, बाढ़ हो, सूखा हो, जातिगत दंगे हो या और कोई राष्ट्रीय आपदा ऐसे हाथ बांधें खड़ी हो जाती हैं जैसे गरीब गाय बिल्कुल बैवस दुनियाभर की बैठकें, दुनियाभर के भाषण, टी.वी., रेडियो पर संदेश-उपदेश एवं नये-नये नियम एवं कानून पर ग्राउण्ड पर कोई काम नहीं सब राम-भरोसे।

अब कोरोना को ही ले लो अक्टूवर 2019 से विश्व स्वास्थ्य संगठन भारत सरकार को आगाह कर रहा था, बता रहा था कि जिस स्तर पर यह महामारी फैलेगी उस स्तर पर आपके पास स्वास्थ्य एवं उपचार की सुविधाएँ नहीं हैं आप करिये अक्टूवर 2019 से सरकार इन चेतावनियों को नजरअन्दाज करती रही अन्त में जब संकट खड़ा हुआ तो सरकार ने तालाबन्दी कर दी यह बोलकर कि हम सारी व्यवस्था कर रहे हैं।

पूरा देश तीन महीने तक तालाबन्दी में रहा स्कूल, कॉलेज तो पूरा साल ही बन्द रहे अरबो -खरबों का अर्थव्यवस्था को नुकसान हुआ। बेरोजगारी बेहताशा बढ़ी, सारा कुछ इस देश की गरीब जनता ने सहन किया इस आशा में कि शायद इस नुकसान की कीमत पर भी देश का स्वास्थ्य संगठन मापदण्डों के आस-पास पहुँच जाए। सरकार ने आश्वस्त किया कि हमने सारी तैयारी कर ली अब डरने की कोई बात नहीं आप सिर्फ मास्क लगाओ और दो गज दूरी रखो जब टीका लगाने का नम्बर आये टीका लगावाओ और मस्त रहो। सरकार ने खुले दिल से सारी परीक्षाएँ बिना पढ़ाये करवायी, सारी विधान सभाओं, नगर पालिकाओं, ग्राम पंचायतों के चुनाव करवाये, बड़े-बड़े मेले करवाये, कुम्भ करवाये, धार्मिक आयोजन करवाये, लोकसभा, राज्यसभा एवं विधान सभाओं के अधिवेशन करवाये, सरकारें बनवायीं, सरकारें तुड़वाई और बड़ी-बड़ी जन सभाएं करवायीं, सीमा विवाद करवायें एवं उन्हें सुलझवाये और आम जनता से कहा कि तुम संयम रखो मास्क लगाओ एवं दो गज की दूरी रखो और टीका लगवाओ फिर भी बीमार हो जाओ तो चिन्ता मत करो हमने सारी व्यवस्था कर रखी है, तुम्हे मरने नहीं देंगे। फिर जनता क्या करती, मरती पिटती अपने रोजमर्रा के कामों पर आ गयी। अब मेट्रो में दो गज दूरी कैसे हो सकती है? रोड़वेज की बस में दो गज दूरी कैसे हो सकती है, वहाँ तो छत तक पर बैठकर खुली हवा में सफर करना पड़ता है, टैम्पों मे दो गज दूरी कैसे रह सकती है।  गरीब एवं मध्यमवर्गीय समाज जब रोटी कमाने निकलता है तब वह अपनी शर्तों पर रोटी नहीं कमा सकता, यह हमारे ऊपर बैठे लोगों को शायद पता नहीं या पता है तो भी वह इसको ध्यान नहीं करते, ऐसे नियम कानून बनाते हैं जिसका पालन असम्भव है। ऐसे चलते-चलते फिर मार्च 2021 आ गया लोग फिर बीमार पड़ने लगे, महाराष्ट्र में हालात बिगड़ने लगे तब भी केन्द्र सरकार नहीं चेती महामारी अपने पाँव पसारने लगी और उसने पूरे देश को अपने आगोश में ले लिया और फिर क्या हाल हुआ अस्पतालों में पैर रखने की जगह नहीं, कहीं भी आक्सीजन नहीं, दवा नहीं, उपचार नहीं, बेड नहीं, कोई सुनने वाला नहीं, श्मशानों में लाशों का ढेर हो गया, मृत शरीरों को जलाने के लाले पड़ गये, श्मशान घाट में लाइनें लग गयी, हर घर में मातम पसर गया। इंसान, इंसान की परछाई से डरने लगा कहीं कोई मदद नहीं, कोई पुकार नहीं, कहीं सुनवायी नहीं, सरकारों के बेतुके नियमन कानून एवं हास्यास्पद घोषणा ऐसा लग रहा है मानो सब कुछ थम गया कोई शासन व्यवस्था नहीं, सब तरफ क्रन्दन ही क्रन्दन। अब तक एक अनुमान के अनुसार 10 लाख लोग मर चुके हैं हिन्दुस्तान में। और कितने मरेंगे पता नहीं। ऐसा क्यों हो रहा है ? इनके मुख्य कारण जो समझ में आते हैं वह निम्न हैं:-

1.    सरकारों का समय पर काम नहीं करना।

2.    देश में स्वास्थ्य सेवाओं का नितान्त अभाव।

3.    विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानको के स्तर पर हमारे देश की स्वास्थ्य सेवाएं नगण्य।

4.    सरकार एवं समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार एवं संवेदनशीलता की कमी।

5.    जनता में जागरूकता एवं अनुशासन की कमी।

6.    गैर जिम्मेदार सरकार एवं स्वार्थी जनता ।

इन परिस्थितियों में तो देश के हालात ऐसा होना स्वाभाविक है। जब भी कोई बड़ी विपदा आती है हमारी सरकार फैसला लेती है कि अब हम पूरी तैयारी करेंगे और ऐसी स्थिति अब नहीं आने देंगे, पर विपदा टलते ही सब कुछ फिर वैसा ही हो जाता है।

इसके मुख्य कारण निम्न हैं:-

1.    समाज न तो जागरूक है और न ही संगठित है। पूरा समाज एकाकी जीवन जी रहा है। हर व्यक्ति अपने या अधिकतम अपने परिवार तक सीमित हो गया है उसे न देश की चिंता है और न समाज की। आज पूरा विश्व हमारे ऊपर हंस रहा है। कहाँ विश्व शक्ति बनने की बात कर रहे थे, कहाँ हम 5000 ट्रिलीयन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने की बात कर रहे थे और कहाँ हम एक छोटी सी महामारी में ऐसे बिखर गये जैसे ताश के पत्तों का महल। हमारे देश का हर व्यक्ति अपना स्वार्थ साधना चाहता है अपने स्वार्थ पूरा करने के लिये वह देश एवं समाज के प्रति कोई भी गलत कार्य करने को तुरन्त तत्पर हो जाता है। फिर देश एवं समाज कैसे बचेगा, इसलिये आवश्यकता है समाज को संगठित कर जागरूक करने की यदि हमारा समाज अपने अधिकारों एवं दायित्वों के प्रति सजग एवं संवेदनशीलता हो जाता है तो देश अपने आप ठीक हो जायेगा यह कार्य देश के नौजवानों को उचित शिक्षा एवं संस्कार देकर ही किया जा सकता है।

2.    सभी सरकारों को जनता के प्रति जबावदेह होना पूर्ण रूप से निष्पक्ष होकर अपनी संवैधानिक जिम्मेदारी को निभाना सरकार का मुख्य कार्य है, जनता को हर कीमत पर न्याय, सुरक्षा एवं सम्मान पूर्वक जीने का अधिकार प्रदान करना है। सरकार सब कुछ करने का प्रयास करती है पर उपरोक्त तीन काम कभी ईमानदारी से नहीं करती बल्कि सरकारें पूरी ईमानदारी से निम्न 10 तरीके के नाटक कर जनता को बेवकूफ बनाती है।

1     समाज में आठ आधारों पर वर्ग विभाजन करके वर्ग विद्वेष फैलाना और उसे वर्ग संघर्ष तक ले जाना- ये आठ राजनीतिक आधार हैं क. धर्म, ख. जाति, ग. भाषा, घ. क्षेत्रीयता, ङ उम्र, च. लिंग, छ. गरीब और अमीर ज. उत्पादक-उपभोक्ता। भारत के सभी राजनैतिक दल आठों आधारों पर वर्ग संघर्ष के प्रयत्नों में पूरी ईमानदारी से सक्रिय हैं। सभी दल पूरी तन्मयता से इस प्रयत्न में लगे हैं। सात आधार तो ऐसे थे जिनसे गांव टूटे, समाज टूटा किन्तु परिवार नहीं टूटे थे। लिंग भेद ने तो परिवारों की एकता को ही छिन्न-भिन्न करना शुरू कर दिया है। पुरुष शोषक है और महिला शोषित इस अर्द्धसत्य ने परिवारों में वर्ग निर्माण तो शुरू कर ही दिया है अब वर्ग संघर्ष भी होना शुरू हो जायेगा। कल्पना कीजिये यदि पति-पत्नी के बीच अविश्वास की दीवार खड़ी हुई तो भविष्य में कैसे बच्चे पैदा होंगे? कैसे उनका पालन-पोषण होगा और कैसे उनके संस्कार होंगे? किन्तु हमारे देश के राजनेताओं को समाज के लाभ-हानि के आंकलन से कोई मतलब नहीं। उन्हें तो अपने लाभ के लिये महिलाओं को वर्ग के रूप में खड़ा करना है, जिसमें वे सफल हो रहे हैं।

2     समस्याओं का ऐसा समाधान खोजना कि उस समाधान से ही एक नई समस्या पैदा होती हो- हमारे देश के सभी राजनैतिक दल पूरी सक्रियता से यह कार्य किया करते हैं। भारत की अधिकांश समस्याएं इनके प्रयत्नों (बाई प्रोडक्ट )का प्रतिफल है।

3     समस्या की प्रकृति के विपरीत समाधान की प्रवृत्ति-  आर्थिक समस्याओं का आर्थिक, प्रशासनिक समस्याओं का प्रशासनिक और सामाजिक समस्याओं का सामाजिक समाधान ही खोजा जाना चाहिए। किन्तु भारत में आर्थिक समस्याओं का प्रशासनिक व सामाजिक, सामाजिक, समस्याओं का आर्थिक व प्रशासनिक और प्रशासनिक समस्याओं का आर्थिक व सामाजिक समाधान खोजने का एक प्रचलन-सा चल पड़ा है। डाकुओं और हत्यारों के हृदय परिवर्तन की बात की जाती है जबकि दहेज, नशा, जुआ, छुआ-छूत जैसी सामाजिक बुराइयों के लिये कानून बनाने की बात की जाती है। मूल्य वृद्धि को रोकने के लिये भी कठोर कानून की वकालत करने वाले बहुत लोग मिलते हैं, कुछ लोग तो ऐसे भी मिलते हैं जो चोरी-डकैती को मजबूरी बताते हैं और ब्लैक को अपराध। जबकि पूरा देश जानता है कि चोरी, डकैती, बलात्कार, मिलावट, हिंसा आदि अपराध हैं, दहेज, छुआ-छूत जातिप्रथा, महिला उत्पीड़न सामाजिक समस्याएं हैं। जबकि वेश्यावृत्ति, ब्लैक, बालश्रम आदि आर्थिक समस्याएं हैं।

4     राष्ट्र शब्द को ऊपर उठाकर समाज शब्द को नीचे गिराना- पूरे भारत में निरंतर यह बात समझाई जा रही है कि राष्ट्र समाज से बड़ा है। राष्ट्र किसी निश्चित भौगोलिक सीमाओं से घिरा हुआ भू-भाग होता है किन्तु समाज की कोई भौगोलिक सीमा नहीं होती है। पाकिस्तान और अमेरिका का रहने वाला समाज का अंग तो होता है किन्तु राष्ट्र का नहीं। स्पष्ट है कि समाज राष्ट्र से बड़ा होता है, भारतीय, पाकिस्तानी, हिन्दू, मुसलमान आदि समाज के हिस्से हैं, प्रकार नहीं; किन्तु समाज की परिभाषा को बदलकर निरंतर संकुचित करने के प्रयत्न जारी हैं। अनेक पढ़े-लिखे लोग भी व्यक्ति और नागरिक शब्द का अंतर नहीं समझते हैं जबकि व्यक्ति समाज का अंग होता है और नागरिक राष्ट्र का।

5     वैचारिक मुद्दों पर बहस को पीछे करके भावनात्मक मुद्दों को आगे लाना- भारत का हर राजनैतिक दल लगातार यह प्रयत्न करता है कि समाज में भावनात्मक मुद्दों पर बहस आगे रहे और वैचारिक मुद्दे पीछे छूट जायें। भारत के भाग्य विधाता जिस संसद में बैठकर भारत की समस्याओं के समाधान पर विचार मंथन करते हैं उसका स्वरूप भी भावनात्मक ही अधिक होता है, वैचारिक कम। संसद में भाषा और वाक्युद्ध से यह बात और स्पष्ट होती है। यह बात ध्यान देने योग्य है कि भारत में प्याज या मंदिर जैसे शुद्ध भावनात्मक मुद्दों पर राष्ट्रीय चुनाव तक जीतने के सफल प्रयास भी हो चुके हैं। किसी नेता की मृत्यु या जेल जाते ही उसकी विशुद्ध गृहिणी को उसके स्थान पर स्थापित करने के प्रयत्न तो अब वर्तमान राजनीतिक प्रथा के रूप में शामिल हो चुके हैं। भारत में कुछ ऐसा वातावरण बना दिया गया है कि यदि कोई राजनेता या दल वैचारिक मुद्दे को आगे लाने की कोशिश भी करे तो वह पूरी तरह असफल हो जाता है।

6     समाज को शासक और शासित में बांटकर दोनों के मनोबल में फर्क करने का संगठित कुप्रयास- इसके लिये समाज के आम लोगों को लगातार अशिक्षित और अयोग्य बता-बताकर उनका मनोबल इस तरह तोड़ा जाता है कि आदमी स्वयं को कमजोर समझने लगता है। इधर, समाज के लोगों का तो मनोबल तोड़ा जाता है और राजनेताओं का मनोबल बढ़ाया जाता है। समाज की विभिन्न इकाइयों को या तो किसी छोटे से छोटे मामले में भी निर्णय नहीं करने दिया जाता या उनके ऐसे किये गये निर्णय को हानिकारक सिद्ध करने का प्रयास किया जाता है। नमक कौन-सा खाना है या विवाह की उम्र क्या हो, ऐसे नितान्त व्यक्तिगत या पारिवारिक मामलों में भी निर्णय का अधिकार शासन ने अपने पास रख लिया है। परिणामस्वरूप आम नागरिक की चिन्तनशक्ति निरंतर घटती जा रही है और वह पूरी तरह शासन पर निर्भर होता जा रहा है।

विचारणीय प्रश्न यह है कि यदि भारत का औसत नागरिक नितान्त पारिवारिक या स्थानीय मामलों में भी निर्णय की क्षमता नहीं रखता है तो उन्हीं के बीच का तथा उन्हीं के समान औसत योग्यता का व्यक्ति सम्पूर्ण भारत के लिए नियम कानून बनाने की योग्यता कहां से प्राप्त कर लेता है? उसकी अन्य लोगों से अधिक योग्यता का मापदंड क्या है? संसद का चुनाव जीतते ही वह सामान्य व्यक्ति भी इतना महत्वपूर्ण कैसे हो जाता है? यह एक ज्वलंत प्रश्न है।

7     समाज द्वारा स्वयं को अपराधी मानने की भावना का विकास- इसके लिये इतने अधिक कानून बनाये जाते हैं कि समाज का कोई भी व्यक्ति उन कानूनों का ठीक से पालन ही नहीं कर पाता। गैर कानूनी कार्यों को समाज में अपराध के रूप में प्रचारित कर देने से अपराध और गैरकानूनी शब्द का भेद मिट जाता है और हर गैरकानूनी कार्य करने वाला स्वयं को अपराधी मानने लगता है। शासन से जुड़े लोग तो समाज के लोगों को दोषी बताते ही हैं। कुछ धार्मिक लोग भी हमेशा हमें ही अपराधी बताकर हमारा मनोबल तोड़ते रहते हैं। कुछ धार्मिक संस्थाएं तो ’’हम सुधरेंगे जग सुधरेगा’’ को नारे के रूप में ही प्रचारित करती रहती हैं। इस प्रचार से वास्तविक अपराधियों को राहत मिलती है और समाज का मनोबल टूटता है। भारत में कुल मिलाकर जितने कानूनों की आवश्यकता है उससे पचास गुना अधिक कानून हैं। ऐसे कानूनों की संख्या लगातार बढ़ाई जा रही है।

8     शासन की भूमिका बिल्लियों के बीच बंदर के समान- बल्लियों के बीच बिना परिश्रम रोटी खाने वाले बंदर की तीन प्रकार की भूमिकाएं हुआ करती हैं  (क.) बिल्लियों की रोटी कभी बराबर न हो, (ख.) बंदर हमेशा रोटी बराबर करता हुआ दिखे किन्तु करे कभी नहीं और (ग.) छोटी रोटी वाली बिल्ली के मन में असंतोष की ज्वाला लगातार धधकती रहे। भारत में सभी राजनैतिक दल पूरी ईमानदारी से तीनों काम कर रहे हैं। आर्थिक असमानता दूर करने में पिछले साठ वर्षों से सभी दल लगातार प्रयत्नशील हैं। कई दल तो चुनावों में ’’गरीबी हटाओ’’ जैसा चुनौती भरा नारा लगाकर चुनाव मैदान में उतरते हैं किन्तु आर्थिक असमानता लगातार बढ़ती जाती है। सभी राजनैतिक दलों के नेता झोपड़ी वालों को लगातार यह बात समझाते रहते हैं कि उसकी झोपड़ी की बगल में बना हुआ महल ही उसकी झोपड़ी में सूर्य की किरणों को आने से रोक रहा है। तुम मेरी मदद करो तो अगले पांच वर्षों में इस भवन को गिराकर यह बाधा मैं दूर कर दूंगा। झोपड़ी वाला साफ देख रहा है कि उसकी झोपड़ी वैसी ही है जैसी पहले थी लेकिन आज भी राजनैतिक दल झोपड़ी वाले के मन में पड़ोसी के प्रति असंतोष की ज्वाला अधिक से अधिक जलाये रखने के लिये प्रयत्नशील है।

9     आर्थिक असमानता वृद्धि का प्रजातान्त्रिक स्वरूप- प्रत्येक राजनैतिक दल यह भरपूर प्रयत्न करता है कि आर्थिक असमानता वृद्धि के उसके प्रयास पूरी तरह अप्रत्यक्ष भी हों और प्रजातांत्रिक भी। इसका तरीका यह है कि (क) जो वस्तुएं गरीब लोग अधिक और अमीर लोग कम उपयोग करते हैं उन वस्तुओं पर अप्रत्यक्ष कर और प्रत्यक्ष सब्सिडी का प्रावधान करें, (ख) जो वस्तुएं अमीर लोग ज्यादा और गरीब लोग कम उपयोग करें उन पर प्रत्यक्ष कर और अप्रत्यक्ष सब्सिडी देनी चाहिये। यदि भारत की पूरी आबादी को तीन भाग (क) गरीब (ख) मध्यम (ग) सम्पन्न वर्ग में बराबर-बराबर बांट दें और समीक्षा करें तो पायेंगे कि गरीब लोग 70 प्रतिशत साइकिलों का उपयोग करते हैं और अमीर लोग शून्य। जबकि रसोई गैस के मामले में इसके उलट हैं अर्थात् गरीब लोग पांच प्रतिशत रसोई गैस उपयोग करते हैं और संपन्न लोग साठ प्रतिशत। भारतीय अर्थव्यवस्था में साइकिल पर प्रति साइकिल ढ़सौ रूपये की सब्सिडी दी जाती है। रसोई गैस के मामले में साम्यवादी और पूंजीवादी दोनों ही आंदोलन करते हैं और साइकिल के मामले में दोनों ही चुप हो जाते हैं। इसी तरह संपन्न वर्ग की आय और व्यय में कुल कृत्रिम ऊर्जा का 70 प्रतिशत खर्च होता है और गरीब वर्ग में चार से पांच प्रतिशत। कृत्रिम ऊर्जा की मूल्य वृद्धि का सभी राजनैतिक दल बढ़-चढ कर विरोध करते हैं जबकि सभी प्रकार के अनाज, खाद्य, तेल, दाल, वनोपज आदि पर टैक्स का कोई विरोध नहीं होता। यहां तक कि पशुचारे में काम आने वाली खली पर भी लगने वाले टैक्स का विरोध नहीं होता। यह बात पूरी तरह प्रमाणित है कि ग्रामीण उत्पादनों पर कर लगने और आवागमन सस्ता होने से शहरी अर्थव्यवस्था मजबूत होती है और ग्रामीण कमजोर। सभी राजनैतिक दल यातायात को सस्ता करने की लगातार मांग करते हैं किन्तु ग्रामीण उत्पादनों पर कर लगने के विरुद्ध कोई आंदोलन नहीं होता। ग्रामीण व्यवस्था पूरी तरह तबाह हो गई है। शहरी अर्थव्यवस्था लगातार प्रगति कर रही है किन्तु आज भी सभी राजनैतिक दल अपने उसी एजेन्डे पर लगातार काम कर रहे हैं। ग्रामीण अर्थव्यवस्था तभी सुदृढ़  होगी जब गाँव स्वावलम्बी होंगे। गाँव स्वावलम्बी तब होंगे जब प्रत्येक गाँव को एक आर्थिक इकाई के रूप में विकसित किया जायेगा। हमारे गाँव सदियों से स्वतंत्रता प्राप्ति के पूर्व तक आर्थिक इकाई थे। कई अर्थों में स्वावलम्बी भी थे जो अब नहीं रहे।

10    प्राथमिकताओं के क्रम में सुरक्षा और न्याय की अपेक्षा जन कल्याणकारी कार्यों का उच्च स्थान रखना- बिल्कुल सामान्य सी बात है कि सुरक्षा और न्याय शासन का प्रथम दायित्व होता है किन्तु भारत की सम्पूर्ण राजनैतिक व्यवस्था में सुरक्षा को बिल्कुल अंतिम प्राथमिकता में रखा गया है। भारत की केन्द्रीय व प्रान्तीय सरकारों के वार्षिक बजट को मिलाकर भी उस बजट का सिर्फ एक प्रतिशत ही पुलिस और न्यायालय पर खर्च होता है। इस एक प्रतिशत बजट में से भी उसका नब्बे प्रतिशत खर्च सुरक्षा और न्याय से हटकर छुआछूत निवारण, बालविवाह, बालश्रम, नशामुक्ति, महिला सशक्तीकरण, आदिवासी हरिजन कानून, दहेज उन्मूलन आदि कम महत्वपूर्ण कार्यों पर खर्च हो जाता है। सुरक्षा और न्याय जैसे प्रयत्नों पर तो कुल बजट का सौ रुपये में से दस नया पैसा ही खर्च होता है। भारत की पुलिस और न्यायालय इन महत्वहीन या कम महत्व के कार्यों के दबाव से इतने अतिभारित हो जाते हैं कि- 1. चोरी, डकैती, लूट, 2. बलात्कार, 3. मिलावट/कमतौल 4. जालसाजी 5. हिंसा, आतंक जैसे पांच प्रकार के गम्भीर अपराध उनके नीचे दब जाते हैं। पुलिस और न्यायालय का बजट बढ़ाये बिना उन पर दायित्वों का बोझ बढ़ाते जाने से दोनों की कार्य क्षमता लगातार घटती गई है। जम्मू-कश्मीर सरकार पर्याप्त सुरक्षा नहीं दे सकी इसलिये वहां सेना भेजनी पड़ी। वहीं सरकार पुलिस पर दायित्व डाल रही है कि पचास से अधिक बाराती एक जगह भोजन करें तो पुलिस उन्हें रोके। छत्तीसगढ़ सरकार नक्सलवाद नहीं रोक पा रही है। उसे तम्बाकू रोकने का काम बहुत महत्वपूर्ण दिख रहा है। क्या तम्बाकू या बाराती नियंत्रण जैसे कार्य इतने अधिक महत्वपूर्ण हैं कि उन्हें सुरक्षा से भी अधिक महत्व दिया जाये? एक बैलगाड़ी के बैलों की क्षमता चालीस क्विंटल वजन ढ़ोने की है और साठ कुंतल वजन लदा होने से गाड़ी अतिभारित है तब उस पर और वनज का प्रयत्न घातक है, चाहे उस पर वजन लाइने वाला मालिक मूर्खतावश ऐसा कर रहा हो अथवा चतुराईवश।

11.   हमारे देश के मतदान के कानून को बदलना होगा, जब कोई जनप्रतिनिधि चुनाव जीतकर सरकारी पद पर आसीन हो जाता है चाहे वह प्रधानमंत्री हो या प्रधानमंत्री की मंत्री परिषद का सदस्य हो या किसी राज्य का मुख्यमंत्री हो या उस राज्य के मुख्यमंत्री के मंत्री परिषद का सदस्य हो जब तक वह मंत्री परिषद भंग नहीं हो जाती वह व्यक्ति खुले आम किसी पार्टी विशेष की चुनाव सभा को कैसे सम्बोधित कर सकता है वह तो एक सरकारी नुमाइन्दा है उसकी तो नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है यह सरासर अपने पद का दुरूपयोग है। कानून में इस बात की पूरी व्यवस्था की जानी चाहिये कि इस तरह के महत्वपूर्ण पदों पर बैठे लोगों को चुनावी प्रक्रिया से दूर रखा जाय।

12.   हमारे देश की चिकित्सा शिक्षा में आमूलचूल परिवर्तन की आवश्यकता है हमारी चिकित्सा शिक्षा परिषद के मापदण्ड इतने कड़े और अव्यवहारिक हैं कि उनके चलते चिकित्सा शिक्षा संस्थान खोजना और उसे ठीक से चलाना असम्भव है। जिसके फलस्वरूप लाखों विद्यार्थी हर वर्ष चिकित्सा शिक्षा में शिक्षा प्राप्त करना चाहते हुए भी प्रवेश नहीं ले पाते यदि हमारी सरकार इन नियमों को व्यवहारिक बनाए तो हमारे यहाँ प्रतिवर्ष लाखों डॉक्टर एवं चिकित्सा सहयोगी तैयार होंगे और देश के कौने-कौने मे जाकर अपनी सेवाऐं देंगे। हम अपने देश में ही नहीं सम्पूर्ण विश्व मे चिकित्सा के क्षेत्र मे अपनी सेवाएं दे सकेंगे।

13.   हमारे देश की सभी सरकारों का एक मात्र उद्देश्य रहता है कि कैसे इस देश की गरीब जनता को मुफ्त राशन, कर्जमॉफी, आरक्षण, धार्मिक उन्माद आदि में उलझाकर रखना और उनको बेवकूफ बनाकर वोट हासिल करना और सत्ता में बने रहना विकास के नाम पर बहुराष्ट्रीय कम्पनियों एवं विदेशी संस्थाओं के हित साधनाभर रह गया है।

अब समय आ गया है जब देश के नौजवान उठें समझे एवं अपनी आवाज बुलन्द करें और इस सोये हुए समाज को जगायें जिससे कि समाज जागरूक एवं संवेदनशील हो जिसे अपने अधिकारों एवं दायित्वों का पूर्ण ज्ञान हो और वह इसको हर कीमत पर हासिल करें और जागरूक समाज एक जिम्मेदार एवं जवाबदेही सरकार बनायें। जो ईमानदारी से जनता के सेवक के रूप में पूर्ण ईमानदारी से निष्पक्ष होकर सारे पूर्वाग्रहों से मुक्त होकर कार्य करें। तब हमारा राष्ट्रीय चरित्र ऊँचा होगा जिस पर हम गर्व कर सकते हैं।

 

!! जय हिन्द!!

 

 


Monday, 6 April 2020

भारत को आत्मनिर्भर बनना होगा

डॉ अशोक कुमार गदिया
चेयरमैन, मेवाड़ यूनिवर्सिटी
आज तालाबंदी के 12 दिन पूरे हो गये हैं। मुझे घर में बंद हुए 16 दिन हो चुके हैं। सपरिवार घर में बंद हूँ। मैं क्या बंद हूँ पूरा भारत बंद है। भारत ही क्या लगभग सारा विश्व बंद है। ऐसा लगता है कि पूरा विश्व रुक-सा गया है। जो शहर 24 घंटों काम करते थे। कभी बंद नहीं होते थे, वे पूर्णतया बंद हैं। सिर्फ आवश्यक सेवाएँ खुली हुई हैं। प्रिंट मीडिया, सोशल मीडिया और टीवी चैनल खुले हुए हैं।
पूरा विश्व भय एवं आशंकाओं से भरा हुआ है। घर बैठे हर वर्ग के लोग दुखी एवं चिन्तित हैं। उनकी मुख्य चिन्ताएँ हैं-
1- यह कोविड-19 कब काबू में आएगा? कब इसकी माकूल दवा बनेगी और लोगों में निश्चिन्तता आएगी?
2- कोरोना वायरस की उपज प्राकृतिक है या मानवकृत? यदि यह मानवकृत है तो यह वायरस किसने तैयार किया?
3- कुछ लोग कहते हैं कि इसे चीन ने अपनी प्रयोगशालाओं में तैयार किया। कुछ लोग कहते हैं कि इसे अमेरिका ने बनाया और चीन में छोड़ दिया। जबकि चीन ने इसे छिपाया है। उसने विश्व स्वास्थ्य संगठन से सांठगांठ कर पूरे विश्व में फैलने दिया। लोग जानना चाहते हैं कि असली कारण क्या हैं? असल कारणों का जानना अति आवश्यक है। क्योंकि इससे अमेरिका एवं चीन को छोड़कर सम्पूर्ण विश्व अपनी अगली रणनीति बनायेगा। द्वितीय विश्व युद्ध से अबतक के घटनाक्रमों पर नज़र डालें तो पता चलता है कि अमेरिका एवं चीन दोनों ऐसे राष्ट्र हैं जिनमें मानवता नाम की भावना अंशमात्र भी नहीं है। इन्हें अपने देश और अपनी दादागिरी से मतलब है। ये दोनों राष्ट्र विश्व के सारे संसाधनों का पूरी तरह से उपभोग करना चाहते हैं। सारे विश्व को आर्थिक, सामाजिक एवं वैचारिक रूप से गुलाम बनाकर रखना चाहते हैं। ये दोनों भी अपनी सर्वश्रेष्ठता तय करने के लिए अप्रत्यक्ष रूप से आपस में लड़ते रहते हैं। दूसरे छोटे एवं गरीब मुल्कों को बर्बाद करते रहते हैं। यह तो सर्वविदित है कि मुस्लिम आतंकवाद की जड़ सऊदी अरब है और अमेरिका इसको संरक्षण देता है। सभी मुस्लिम देशों में ज़बरदस्त झगड़े एवं फसाद करवाता है। अमेरिका ही धीर-धीरे उनको बर्बाद कर रहा है। यह भी सर्वविदित है कि अमेरिका एवं यूरोप ऐसी दवाइयाँ बना रहा है कि जो आम आदमी में एक रोग का इलाज कर उसमें दूसरा रोग पैदा कर देती हंै, जिससे उनका गोरखधंधा दिन दोगुना रात चैगुना चलता रहे। यह भी सर्वविदित है कि अमेरिका एवं चीन एक से बढ़कर एक विध्वंसक हथियार बना रहे हैं और दूसरे देशों को बेरोक-टोक बेच रहे हैं। यह भी सर्वविदित है कि अमेरिका एवं चीन विश्व के सभी बुद्धिमान लोगों को अपने पास बुलाकर उनकी मेधा का उपयोग अपनी सम्पत्ति बढ़ाने एवं बाकी सभी देशों के शोषण करने में लगा हुआ है।
यह भी सर्वविदित है कि दुनिया की अधिकांश भौतिक एवं बौद्धिक सम्पदा एवं क्षमता चीन एवं अमेरिका या उनके पिट्ठू देशों में केन्द्रित है। यह भी सर्वविदित है कि अमेरिका एवं चीन दोनों को भारत एवं भारत की भौतिक, बौद्धिक एवं युवा जनशक्ति फूटी आँख नहीं सुहाती है। यह भी सर्वविदित है कि अमेरिका एवं चीन भारत की अखंडता, अनेकता में एकता, प्रजातंत्र, सर्वधर्म सम्भाव, ईश्वरीय विश्वास एवं हर मुसीबत के समय 130 करोड़ लोगों को सारे मतभेद भुलाकर एक हो जाना बिल्कुल भी रास नहीं आता। यह भी सर्वविदित है कि अमेरिका एवं चीन भारत में हर तरह के षड्यंत्र रचकर इसे विघटित कर इस विशाल एवं महान देश के टुकड़े-टुकड़े करना चाहता है। इसके लिए दोनों देश पाकिस्तान का भरपूर इस्तेमाल करते हैं। तो इसमें क्या शंका है यदि कोरोना अप्राकृतिक है तो, या तो इन दोनों देशों की या इनमें किसी एक की यह कारस्तानी ज़रूर है। ये लोग अपने देश को छोड़कर पूर्णरूप से अमानवीय हैं। अतः ऐसी स्थिति बनाकर सारे विश्व में अफरा-तफरी फैलाकर ये अपना उल्लू सीधा करने की कोशिशों में लगे हुए हैं। सारे विश्व की अर्थव्यवस्था बर्बाद कर सारी सम्पत्ति हथिया लेने की फिराक में हैं। इसलिये यह बड़ी चिन्ता का विषय है।
4- लोगों की यह भी चिन्ता है कि लाॅकडाउन खुुलने पर देश में रोज़गार, व्यापार, अर्थव्यवस्था, शिक्षा, कृषि आदि का क्या होगा?
5- लोगों की यह भी चिन्ता है कि यह कोरोना फिर अक्टूबर-नवम्बर के महीने में वापस तो नहीं आ जाएगा?
इन सब चिन्ताओं के मध्य यह समझ आता है कि भारत के पुनर्निर्माण का समय आ गया है। हमारे नेताओं, नीति निर्धारकों, बुद्धिजीवियों, समाजसेवकों, लेखकों, साहित्यकारों, कवियों एवं पक्षकारों को मिल-बैठकर हमारे व्यापारियों और उद्योगपतियों को विश्वास में लेकर निम्नलिखित फैसले लेने पड़ेंगे-
1- भारत अपनी ज़रूरत की हर वस्तु अपने यहाँ बनायेगा। चाहे इसकी कितनी भी क़ीमत जनता को क्यों न देनी पड़े।
2- भारत सिर्फ निर्यात करेगा। तकनीक को छोड़कर बाकी का आयात योजनबद्ध तरीके से अगले 5 वर्ष में बिल्कुल ख़त्म कर देगा।
3- भारत सिर्फ तकनीक का आयात करेगा। किसी विषयवस्तु का नहीं।
4- भारत अपनी कृषि का उत्कृष्ट विकास करेगा और इसे उद्योग का दर्जा देगा। हर क़ीमत पर इसे लाभकारी क्षेत्र बनाएगा।
5- भारत श्रम का शोषण हर क़ीमत पर ख़त्म करेगा।
6- भारत अपनी आंतरिक एवं बाहरी सुरक्षा मजबूत करेगा।
7- भारत का हर नौजवान 18 वर्ष की उम्र के बाद 2 वर्ष के लिए फौज में काम करेगा।
8- भारत अपनी हर क़ीमत पर न्याय व्यवस्था पारदर्शी एवं मजबूत करेगा। 
9- भारत में दसवीं कक्षा तक की शिक्षा अनिवार्य हो, निःशुल्क हो, सबके लिए समान पाठ्यक्रम हो और सबके लिए एक तरह की सुविधाएँ हों, जिसमें भारत का गौरवशाली इतिहास, संस्कृति, सभ्यता, साम्प्रदायिक सद्भाव, सामाजिक संवेदनशीलता, महापुरुषों की जीवनियाँ अनिवार्य रूप से पढ़ाई जाएँ। देशभक्ति एवं समाजसेवा का भाव हर नौजवान में स्वाभाविक रूप से विकसित हो सके, इसकी समुचित व्यवस्था हो। बच्चे का दसवीं कक्षा पास करने का पैमाना भी यही हो। तभी भारत बच पाएगा।

Sunday, 29 March 2020

कभी सोचा न था कि..

दुनियाँ भर में फैले कोरोना संकट पर मेवाड़ विश्वविद्यालय के कुलाधिपति डॉ अशोक कुमार गदिया की एक महत्वपूर्ण कविता


कभी सोचा न था कि
इस तरह घरों में क़ैद होकर रहना पड़ेगा।
कभी सोचा न था कि
विकास की अंधी दौड़ में
मानव प्रजाति
अपने ही विनाश का सामान
खुद ही बनाने लगेगी।
कभी सोचा न था कि
विश्व का विज्ञान, तकनीक, प्रौद्योगिकी,
प्रकृति की छोटी-सी मार के सामने घुटने टेक देगी।
कभी सोचा न था कि
विश्व के सभी बाज़ार, यातायात के साधन, देवालय
सभी एक साथ बंद हो जाएंगे।
कभी सोचा न था कि
चीन, अमेरिका, यूरोप के सभी देश मिलकर
कुछ कर नहीं पाएंगे।
उनके शीर्ष नेता बेबस, लाचार एवं मजबूर दिखाई देंगे।
कभी सोचा न था कि
प्रकृति, मानव की विकृति को
इतनी बड़ी सज़ा देगी कि
मानव प्रजाति का अस्तित्व ही ख़तरे में पड़ जाएगा।
कभी सोचा न था कि
आदमी को आदमी से दूर कर दिया जाएगा।
कभी सोचा न था कि
इंसान को इंसान से दूर रखने में ही
जीवन की कल्पना होगी।
कभी सोचा न था कि
मानवकृत विकास, वैभव, संसाधन, धन-दौलत
सभी बेमाने हो जाएंगे।
ज़िन्दगी बचाने के लाले पड़ जाएंगे।
कभी सोचा न था कि
‘जान है तो जहान है’ की कहावत
अपने जीते जी चरितार्थ होगी और
सारा विश्व इस बात को
गला फाड़-फाड़कर कहेगा।
कभी सोचा न था कि
विश्व के सभी लोगों को भारतीय दर्शन,
भारतीय शिष्टाचार एवं
भारतीय खान-पान अपनाना पड़ेगा और
इसी में सर्वकल्याण है, यह कहना पड़ेगा।
कभी सोचा न था कि
अहिंसा परमो धर्म, त्याग-तपस्या एवं
एकांतवास जीवन का फलसफा होगा।
अब सोचता हूँ कि
ईश्वर प्रकृति अपनी कृपा करे,
मानव की ग़लतियों को माफ करे।
इस जाति को बचाये एवं
हम सबको दहशत से उबारे।
हमें अपने घरों में इस अनचाही क़ैद से मुक्त करे।
लेखक
डॉ. अशोक कुमार गदिया
चेयरमैन, मेवाड़ ग्रुप ऑफ इंस्टीट्यूशंस
चेयरमैन, विश्वविद्यालय